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बुद्ध की इन तस्वीरों को देखकर पूरी दुनिया चौंक रही है, देखिए क्या है इनकी हकीकत

पूरी दुनिया बुद्ध की इन तस्वीरों को देखकर चौंक रही है, देखिए क्या है इनकी हकीकत

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इंदौर . गौतम बुद्ध की इन तस्वीरों दो देखकर कोई भी इंसान चकरा सकता है। एक नजर में आपको यह समझ नहीं आएगा कि यह सच में कोई तस्वीर है या कुछ और है। दरअसल यह थंका आर्ट है। एक ऐसी प्राचीन और समृद्ध कला जो पूरी तरह से बौद्ध धर्म और भगवान बुद्ध पर केंद्रित है।

थंका तिब्बती भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है एेसी वस्तु जिसे लपेट कर रखा जा सके। थंका चित्र कपड़े बनते हैं इसलिए इन्हें थंका पटचित्र कहा जाने लगा और ये कला की एक शैली की तरह विकसित हो गया।

इंदौर में डॉ. सुधा वर्मा एेसी चित्रकार हैं जिन्होंने थंका पटचित्रों पर पीएचडी की है और इन पर एक किताब भी लिखी है। करीब 70 बरस की उम्र में भी वे कला के क्षेत्र में सक्रिय हैं और इस प्राचीन कला को जीवित रखने की कोशिश कर रही हैं।

देहरादून में पली-बढ़ी डॉ. सुधा वर्मा ने वहीं पर 1967 फाइन आर्ट में एमए किया और उसके बाद उनकी शादी हो गई और पति का ट्रांसफर पटना हो गया। पटना के म्यूजियम में उन्होंने पहली बार थंका पटचित्र देखे और उन्हें देख कर ही इस कला में रुचि जागी।

उन्होंने थंका पटचित्रों की अपनी पीएचडी का विषय बनाया। थंका आर्ट के बारे में गहरी जानकारी के लिए वह बिहार के बोधगया और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भी गईं जो कि बौद्ध धर्म का बड़ा केंद्र है।

गौतम बुद्ध पर केंद्रित कला
डॉ. वर्मा बताती हैं कि थंका कला पूरी तरह से गौतमबुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म पर केंद्रित है। इस कला का विषय बुद्ध, बुद्ध के अवतार, बोधिसत्व और उनसे जुड़ी कहानियां, मान्यताएं आदि हैं। बौद्ध मंदिरों में ही ये कला विकसित हुई और फली फूली।

वैसे थंका पटचित्र कला भारत से ही तिब्बत पहुंची थी, लेकिन बाद में ये जापान, चीन, कोरिया आदि देशों में पहुंची और वहां लोकप्रिय हुई। वहां बौद्ध मंदिरों से लेकर घरों तक में थंका पटचित्र देखे जा सकते हैं।

झलकती बौद्ध मान्यताएं
सुधा ने बताया कि थंका पटचित्रों में गौतम बुद्ध और उनके अवतार जैसे अवलोकितेश्वर, पद्मसंभव, अमितायु, रत्न संभव आदि के साथ मैत्रेय यानी भविष्य के बुद्ध को भी बनाया जाता है। चित्रों में बुद्ध के बचपन, विवाह, तपस्या, निर्वाण आदि के साथ बौद्ध दर्शन नजर आता है।

चित्र बनाते समय कई बौद्ध मान्यताओं को ध्यान रखा जाता है जैसे अमितायु को हमेशा लाल रंग में बनाया जाता है क्योंकि बौद्ध मान्यता के अनुसार उन्हें सूर्य के समान माना जाता है। तपस्वी शाक्य मुनि यानी बुद्ध के एक हाथ में भिक्षा पात्र और दूसरा हाथ धरती को छूता हुआ होता है जिसे भूस्पर्श मुद्रा कहते हैं।

हर चित्र में चांद-सूरज जरूर होते हैं क्योंकि इन्हें समय की गति का प्रतीक माना जाता है। अष्टमंगल चिन्ह भी बनाए जाते हैं। हर फिगर को बनाते समय उसके रंग और मुद्रा का ध्यान रखा जाता है।

प्राकृतिक रंगों का होता था प्रयोग
प्राचीन समय में रेशम के कपड़े पर प्राकृतिक रंगों से ही चित्रकारी होती थी पर अब प्राकृतिक रंग मिलना कठिन होता है इसलिए अब रेशम के कपड़े पर टेम्प्रा, एक्रिलिक या ऑइल कलर्स से बना लेते हैं।

पहले रेशम के कपड़े पर चित्र बनाया जाता है फिर उसके आसपास किसी दूसरे रंग के कपड़े की पाइपिंग लगाई जाता है और फिर इस चित्र को ब्रोकेड या किसी अच्छे कपड़े पर सूई-धागे से टांकते हैं। टांकने के बाद आसपास फिर एक लेस लगा दी जाती है।

जिस कपड़े पर चित्र टांका जाता है उसके दोनों और लकड़ी लगाई जाती है जिसके जरिए इन्हें दीवार पर टांगा जाता है।