19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बीपी-शुगर, हार्ट जैसी गंभीर बीमारियां होने से पहले होगा इलाज

अब बीपी, शुगर, हार्ट, कैंसर आदि गंभीर बीमारियां होने से पहले ही उनका इलाज हो जाएगा, जिससे व्यक्ति को ये बीमारियां नहीं होगी या उनका असर नाम मात्र का रह जाएगा.

2 min read
Google source verification
बीपी-शुगर, हार्ट जैसी गंभीर बीमारियां होने से पहले होगा इलाज

बीपी-शुगर, हार्ट जैसी गंभीर बीमारियां होने से पहले होगा इलाज

इंदौर. अब बीपी, शुगर, हार्ट, कैंसर आदि गंभीर बीमारियां होने से पहले ही उनका इलाज हो जाएगा, जिससे व्यक्ति को ये बीमारियां नहीं होगी या उनका असर नाम मात्र का रह जाएगा, इसके लिए मध्यप्रदेश के इंदौर में स्वाब का डीएनए टेस्ट किया जा रहा है, जिससे पहले ही पता चल जाता है कि व्यक्ति कौन सी बीमारी की चपेट में आ सकता है, इसका पहले ही इलाज शुरू हो जाता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी नंबर वन बनने की कवायद में जुटे इंदौर के युवाओं ने ऐसी तकनीक ईजाद की है, जो भविष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में पहले ही आगाह कर देती है। स्वाब (लार) से हासिल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर कई लोग इन बीमारियों का प्रिवेंटिव इलाज भी ले रहे हैं।


प्रिवेंटिव हेल्थ केयर के लिए मायडीएनएपीडिया क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इससे न सिर्फ डायबिटीज, ब्लड प्रेशर जैसी लाइफ स्टाइल से जुड़ी बीमारियों की आशंका पहले से पता की जा सकती है बल्कि कैंसर, किडनी, हार्ट की भविष्य में होने वाली गंभीर परेशानियों का भी करीब-करीब सटीक अनुमान लगाया जा रहा है। देश के कई बड़े अस्पतालों और डाइग्नोस्टिक सेंटरों में धीरे-धीरे इस टेस्ट को प्राथमिकता दी जाने लगी है। देश के कई नामी स्पोट्र्स क्लब अपने खिलाडिय़ों का भी ये टेस्ट करा रहे हैं। इसकी रिपोर्ट के आधार पर वे कमियां दूर कर पा रहे हैं।


एक प्रतिशत डीएनए का ही अंतर
रिमी सैनी ने पल्लव खंडेलवाल व अंकित अग्रवाल के सहयोग से किट की खोज की है। रिमी के अनुसार सभी लोगों में 99% डीएनए समान होता है। एक फीसदी के अंतर से ही हमारी कद-काठी, स्वास्थ्य में बदलाव आता है। इसी 1% डीएनए का सैंपल लेने की प्रक्रिया आसान है। टेस्ट साधारण होने से स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। जांच के लिए किट से बकल कैविटी पर 10 बार रब करना है। टेस्ट के लिए एक पैनल सेटअप किया है। इससे बीमारियों की आशंका आसानी से पहचानी जा सकती है। रिमी ने बताया कि इंदौर से बीफार्मा करने के बाद बीआइटी रांची से एमफार्मा किया। फार्मा इंडस्ट्री में तीन साल तक काम किया। पति का ट्रांसफर इंदौर हुआ। यहां मेरे पिताजी का डाइग्नोस्टिक का काम था। फार्मा इंडस्ट्री और डाइग्नोस्टिक इंडस्ट्री में बीमारी के बाद जांच और उपचार है। तब विचार आया कि क्यों न ऐसी तकनीक पर काम हो, जिससे बीमारी होने से पहले ही बचाव के लिए कदम उठाए जा सकें।

यह भी पढ़ेः बागेश्वर धाम प्रमुख पं. धीरेंद्र शास्त्री ने कही मां-बाप को लेकर बड़ी बात