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ध्रुपद में सधे हुए सुर और सितार पर उस्ताद की अंगुलियों के जादू से मंत्रमुग्ध हुए कला पारखी

सांघी संगीत समारोह में उदय भवालकर का ध्रुपद गायन और उस्ताद शुजात खां का सितार वादन

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Uday Bhawalkar

ध्रुपद में सधे हुए सुर और सितार पर उस्ताद की अंगुलियों के जादू से मंत्रमुग्ध हुए कला पारखी

इंदौर . सोहनलाल सांघी स्मृति संगीत समारोह का आगाज दो बेहतरीन फनकारों की शानदार परफॉर्मेंस से हुआ। आनंदमोहन माथुर सभागृह में पहली सभा में डागर बंधुओं के शागिर्द उदय भवालकर ने ध्रुपद गायन किया और दूसरी सभा में उस्ताद विलायत खां के बेटे और शागिर्द उस्ताद शुजात खां ने सितार वादन पेश किया।
उदय भवालकर ने राग छायानट से शुरुआत की। गंभीर स्वर में लंबा आलाप लिया। ध्रुपद के अमूर्त से बोलों में उनके बुलंद और सधे हुए स्वर ने शहर के संगीत पारखियों को प्रभावित किया। इसी राग में उन्होंने एक बंदिश गाई, गौरी लचकत आवे हो अबीर गुलाल की भर भर झोरी...। इस बंदिश को सुनते हुए महसूस हुआ कि वे डागर बंधुआें की विरासत के सही वारिस हैं। इसके बाद राग बसंत में उन्हांेने बंदिश गाई भंवरा फूली बन सघन बेलरिया..., बेहद रसपूर्ण इस बंदिश से आगे बढ़ते हुए उन्होंने एक और बंदिश गाई, सुर संगत सौं गावे तब ही रिझावे...। शहर में आमतौर पर ध्रुपद के कार्यक्रम कम होते हैं और ध्रुपद सुनने की चाहत रखने वाले संगीतप्रेमियों को भवालकर ने पूरी तरह संतुष्ट किया। उनके साथ पखावज पर संगत की प्रताप अवाड़ ने।
राग झिंझोटी से शुजात खां ने की शुरुआत
दूसरी सभा में मंच पर आए उस्ताद शुजात खां ने राग झिंझोटी चुना। इसमें आलाप, जोड़ झाला बजाते हुए राग का विस्तार किया। उनकी अंगुलियां सितार पर जादू जगा रही थीं और श्रोता सम्मोहन में बंधे मंत्रगुग्ध से सुन रहे थे। गायकी अंग से बजा उनका सितार जैसे बज नहीं रहा था, बल्कि गा रहा था। तंत्रकारी और लयकारी का एेसा समागम अवर्णनीय आंनद की तरह था। सितार पर बजाते हुए कुछ प्रयोग भी करते रहे जैसे अपने साज से खेल रहे हों। उनके साथ तबले पर संगत कर रहे रामेन्द्र सिंह सोलंकी और अमित चौबे की संगत भी शानदार रही। कई बार उस्ताद ने उन्हें स्पेस दिया और दोनों की तारीफ भी करते रहे।

अमीर खां साहब की छाया है मुझ पर
उस्ताद शुजात खां ने इंदौर से अपने पुराने रिश्ते याद करते हुए बताया, उनके परदादा इमदाद खां साहब इंदौर में रहे थे। उन्होंने कहा, मैंने कई महान गायकों से भी बहुत सीखा है, जिनमें पं. भीमसेन जोशी भी हैं, लेकिन मैं उस्ताद अमीर खां साहब से बेहद प्रभावित हूं और मुझ पर अपने वालिद की छाया के बाद किसी की छाया है, तो वे हैं उस्ताद अमीर खां साहब। इस बात पर सभी श्रोताओं ने तालियां बजाईं।

गायकी का रंग

उस्ताद शुजात खां अच्छे गायक भी हैं, अंत में उन्होंने गायकी की बानगी भी दिखाई। उन्हांेने पहले एक गजल गाई, कहां रुकने थे रास्ते कहां मोड़ था उसे भूल जा..., वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा..., इस पर उन्हें खूब दाद मिली। गजल के बाद छाप तिलक सब छीनी मोसे नैना लगायके गाया और इसे बीच में छोड़ वैष्णव जन तो तेने कहिए की दो पंक्तियां भी गाईं। उनकी गायकी का यह रंग देखकर श्रोता चमत्कृत थे। जब उस्ताद ने इजाजत मांगी तो लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाते हुए सम्मान दिया।