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हिस्सों में बना था होलकर राजवंश का राजबाड़ा, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लगा दी थी आग 

राजबाड़ा के मामनले में मशहूर है कि इसके बनने से पहले ही बिगड़ने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसे बार-बार तोड़ा गया, जलाया गया लेकिन यह फिर अपनी आन-बान-शान से खड़ा हो गया।

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Shruti Agrawal

Jan 16, 2017

unknown facts of royal residence of holkars

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इंदौर। मध्यप्रदेश का दिल राजवाड़ा और यहां की ऐतिहासिक धरोहर है होलकर राजवंश का राजबाड़ा। राजवाड़ा अपने फ्रेंच, मुगल और मराठा खूबयों से सजे आर्किटेक्ट को लेकर जितना मशहूर है इतिहास उतना ही रहस्यमय है इसका इतिहास।

राजबाड़ा के मामनले में मशहूर है कि इसके बनने से पहले ही बिगड़ने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसे बार-बार तोड़ा गया, जलाया गया लेकिन यह फिर अपनी आन-बान-शान से खड़ा हो गया। 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद भी इसे आग के हवाले कर दिया गया था।


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रुक-रुक कर हुआ निर्माण -

मल्हारराव होलकर को तीन अक्टूबर 1730 को मराठों ने उत्तर भारत के सैनिक अभियानों का नेतृत्व सौंपा। सैनिक अभियानों की व्यस्तता के कारण उन्होंने स्थायी निवास के लिए छत्रपति शाहू से निवेदन किया। इस निवेदन पर पेशवा बाजीराव ने 1734 ई. में मल्हार राव की पत्नी गौतमाबाई होलकर के नाम खासगी जागीर तैयार करवायी, जिसमें इंदौर भी था। सन 1747 में मल्हारराव प्रथन ने राजवाड़ा की नींव रखी थी।

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6174 वर्गमीटर जमीन पर संगमरमर, लकड़ी, ईट, मिट्टी, गारे की मदद से फ्रेंच शैली का उपयोग करते हुए इस भव्य प्रसाद की नींव डाली गईं। 1761 में मल्लहारराव प्रथम अहमद शाह अब्दाली से जंग में हार गए। सदमें से उनकी तबीयत खराब रहने लगी। राजबाड़ा का निर्माण बीच में ही रुक गया। सन 1765 में उनका निधन हो गया। इसके कुछ समय बाद होलकरों का यह राजप्रसाद बनकर तैयार हुआ।

इस सात मंजिला भवन में नीचे की तीन मंजिले मार्बल की बनी थी। उपरी चार मंजिलों को सागौन की लकड़ी की मदद से बनाया गया था। राजबाड़ा 918 फुट लंबी और 232 फुट चौड़ी इस इमारत का प्रवेश द्वार 6.70 मीटर ऊंचा है, जिसकी संरचना हिंदू शैली के महलों की तरह है। होलकरों का दरबार हॉल जिसे गणेश हॉल कहा जाता है वह फ्रेंच शैली में बनाया गया है।


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आग और राजबाड़ा का नाता-
सन 1801 में सिंधिया के सेनापति सरजेराव घाटगे ने इंदौर पर आक्रमण किया । इस आक्रमण में घाटगे ने राजबाड़ा के एक बड़े हिस्से को जला कर नष्ट कर दिया। इसके बाद मल्हारराव द्वितीय के शासनकाल में उनके प्रधानमंत्री तात्या जोग ने एक बार फिर से राजबाड़ा का निर्माण कार्य शुरु करवाया।

इसके बाद 1834 में राजबाड़ा फिर अग्निकांड का शिकार हुआ। अचानक आग लगने के कारण इसकी एक उपरी मंजिल पूरी तरह जलकर खाक हो गईं।

इसके बाद समय बीतता गया 1984 में इंदिरा गांधी हत्याकांड के समय हुए दंगों में कुछ अराजक तत्वों ने इसमें आग लगा दी थी।


918 फुट लंबा और 232 फुट चौड़ा-
शहर के मध्य 6175 वर्गमीटर में 29 मीटर की ऊंचाई वाले राजवाड़ा को बनाने में मल्लाराव होलकर द्वितीय के समय 4 लाख रुपए खर्च किए गए। 918 फुट लंबी और 232 फुट चौड़ी इस इमारत का आकर्षक प्रवेश द्वार 6.70 मीटर ऊंचा है। इसकी संरचना में हिंदू मराठा, राजपूत औऱ फ्रेंच शैली झलकती है। राजवाड़ा सात मंजिलों का प्रसाद है जिसमें सुंदर झरोखे बनाए गए हैं। इन मंजिलों के प्रथम तीन तल प्रस्तर के राजपूत शैली और काष्ठ से निर्मित हैं। बाकी 4 मंजिलों पर मराठा शैली की छाप दिखती है। वहीं राजवाड़ा का पूरा बाहरी आवरण में फ्रेंच स्थापत्य शैली की झलक मिलती है।


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वर्तमान स्थिति-
वर्तमान में अवशिष्ट गणेश हॉल जो होलकर का दरबार हाल माना जाता है। क्लासिकल फ्रेंच शैली का बना हुई है। इस भवन के पूर्वी भाग को छोड़कर अन्य हिस्सों में कई कमरे बनाए गए थे। कई कक्षों में सुंदर भित्ति चित्र बनाए गए थे। जो कक्षम, नाथ द्वार, कोटा, बूंदी और मालवा शैली के संयोजन से बनाए गए थे। राजवाड़ा महल शहर के प्रमुख्य आकर्षण में से एक है। लकड़ी और लोहे से निर्मित राजसी संरचना से बना महल का प्रवेश द्वार यहां आने वाले हर पर्यटक का स्‍वागत करता है।
यह पूरा महल लकड़ी और पत्‍थर से निर्मित है। बड़ी - बड़ी खिड़कियां, बालकनी और गलियारे, होलकर शासकों और उनकी भव्‍यता का प्रमाण है। इंदौर आने वाले हर पर्यटक को रजवाड़ा अवश्‍य आना चाहिए।

एक हिस्सा भरभराकर गिरना-
राजबाड़ा का एक हिस्सा तो 4 जुलाई 2016 को एकाएक ध्वस्त हो गया। इसके बाद पूरी ऐतिहासिक इमारत पर ही खतरा बना हुआ है। यहां कई और हिस्से हैं, जो पुरातत्व विभाग की अनदेखी से कमजोर हो चुके हैं। हालत यह है कि इमारत में जगह-जगह पर दरारें सामने आने लगी हैं जबकि इसे बचाने के नाम पर 1984 से लेकर अब तक सरकार और स्वयंसेवी संगठन 200 करोड़ खर्च कर चुके हैं।

राजबाड़ा के उत्तरी परकोटे (गोपाल मंदिर की गली) के हिस्से में लंबी दरारें आ चुकी है। यहां परकोटे के ऊपरी हिस्से में लगे पत्थर भी दरकने लगे हैं। यहां कई जगह पर बड़े छेद हो गए हैं, जो इस हिस्से के कमजोर होने की गवाही खुद दे रहे हैं। इसके ठीक नीचे बाजार लगने से यहां कोई घटना होने पर जनहानि होने की भी आशंका है। राजबाड़ा के मुख्य द्वार की सबसे ऊपरी मंजिल जहां झंडा लहराता है, उसकी छत काफी कमजोर हो चुकी है। इस छत में से लगातार पानी टपकता रहता है, वहीं छत का काफी हिस्सा अब तक अंदर ही गिर चुका है जबकि सालभर पहले ही पुरातत्व विभाग ने यहां पर 1 करोड़ रुपए का मरम्मत का काम कराया था। अभी राजवाड़ा के इस हिस्से के पुनर्निमार्ण का कार्य जारी है।

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