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विद्या ने पहनी थी चंदेरी की ये डिजाइनर साड़ी

नेशनल हैंडलूम एक्सपो में आई चंदेरी के डवलपमेंट सेंटर में डिजाइन हुई साड़ी ...

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vidhya balan chanderi saree

इंदौर . चंदेरी में मप्र हस्तशिल्प और हथकरघा विकास निगम का डवलपमेंट सेंटर हैं, जहां चंदेरी के फैब्रिक की क्वालिटी बढ़ाने और वीविंग की डिजाइंस पर काम होता है। उसी सेंटर में डवलप की हुई साड़ी को कुछ महीने पहले मुंबई में लगाई गई मृगनयनी की प्रदर्शनी में विद्या बालन ने पहना था। इस साड़ी की एक और प्रतिकृति अर्बन हाट में चल रहे नेशनल हैंडलूम एक्सपो में मृगनयनी के स्टॉल पर देखी जा सकती है। सोमवार को यहां शहर के फैशन डिजाइनिंग के स्टूडेंट्स के लिए स्टॉल डेकोरेशन की कॉम्पीटिशन हुई, जिसमें आई स्टूडेंट्स इस साड़ी को पहन कर देखने से अपने को रोक नहीं पाईं।

मेला प्रभारी डीके शर्मा ने बताया कि इस सफेद रंग और काले-सुनहरे बॉर्डर की साड़ी का फैब्रिक विशेष प्रकार का कॉटन है क्योंकि इसमें कॉटन काउंट 2/200 है जो कि रेयर काउंट होता है। इस कारण इसमें सिल्क जैसी फिनिश आती है। देखने ही नहीं बल्कि छूने पर भी रेशम जैसी महसूस होती है। इस पर वीविंग के मोटिफ भी डिजाइनर्स ने डवलप किए हैं। यहां मलबरी और कोसा के धागों को कॉटन धागों के साथ मिलाकर बनाए गए नए फैब्रिक की साडि़यां भी हैं।

16 बार छपने के बाद तैयार होता है नांदना प्रिंट
नीमच के तारापुर गांव से आए दिनेश झारिया नांदना प्रिंट की साड़ी लेकर आए हैं। उन्होंने बताया कि नांदना प्रिंट की परंपरा 500 बरस पुरानी है पर ये पिछले कई वर्षों से भुला दी गई थी। अब उनके परिवार ने अपने पुरखों की इस कला को रिवाइव किया है। इसमें पूरी तरह वेजिटेबल कलर्स का उपयोग होता है। नांदना प्रिंटिंग काफी कठिन काम है क्योंकि इसमें 16 बार धुलाई और नौ बार छपाई होती है तब जाकर प्रिंट पूरी तरह आकार लेता है। झारिया बताते हैं कि पहले प्लेन कपड़े पर ब्लॉक प्रिंट किया जाता है फिर उसे धोया जाता है।

फिर उबलते पानी मे अलीजरीन के साथ उबाला जाता है। ठंडा होने को बाद डामर और फिरोजा को उबाल कर उस घोल में ब्लॉक को डुबा कर फिर प्रिंट करते हैं। इस प्रोसेस के बाद चार-पांच बार फिर डाई की प्रोसेस होतीे है। इसके बाद प्रिंट पर चूना और गोंद लगाकर रखा जाता है। बाद में कपड़े को फिर रातभर पानी में भिगो सुबह धुलाई करते हैं। अनार के छिलके उबाल कर उस पानी में कपड़े को डाइकिया जाता है। सूखने के बाद हरे रंग के लिए धवई के फूलों के पानी में भिगोया जाता है।