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अहंकार का पर्दा हटाए बिना हम नहीं बन सकते परिपूर्ण और ब्रम्ह

- युगपुरूष धाम बौद्धिक विकास केंद्र परिसर में अनंतेश्वर महादेव की प्राण प्रतिष्ठा, साध्वी ऋतम्भरा भी पहुंची

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SUDHIR PANDIT

अहंकार का पर्दा हटाए बिना हम नहीं बन सकते परिपूर्ण और ब्रम्ह

इंदौर। स्वयं का अस्तित्व मिटा कर ही बीज वृक्ष में बदलता है। हम वृक्ष तो बनना चाहते हैं लेकिन अस्तित्व को भी बचा कर रखना चाहते हैं। परमात्मा और हमारे बीच अहंकार का पर्दा है। जब तक यह पर्दा नहीं हटेगा, तब तक हम परिपूर्ण और ब्रम्ह नहीं बन सकते। मांगने का काम तो भिखारी करते हैं। हम यदि धन से संपन्न नहीं हैं तो दूसरों को प्रेम और सम्मान तो बांट ही सकते हैं जिसमें कोई पैसा नहीं लगता। दुख बांटेंगे तो दुख और सुख बांटेंगें तो सुख। हम सब अंदर से बहुत दरिद्र हैं। आत्मरमण कर आत्मानंद बनेंगे तो संसार के सबसे बड़े व्यक्ति बन जाएंगे।
शनिवार को युगपुरूष स्वामी परमानंद गिरी ने पंचकुईया स्थित परमानंद हास्पिटल एवं युगपुरूष धाम बौद्धिक विकास केंद्र परिसर में चल रहे अनंतेश्वर महादेव परिवार के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव एवं अपने 63वें संन्यास जयंती महोत्सव के समापन प्रसंग पर उक्त विचार व्यक्त किए। प्रारंभ में आश्रम ट्रस्ट की ओर से जान्हवी पवन ठाकुर, तुलसी शादीजा, डॉ अनिता शर्मा, गिरधारीलाल गर्ग, राजेंद्र गर्ग, विजय शादीजा आदि ने उनका स्वागत किया। प्रख्यात साध्वी ऋतम्भरा देवी ने भी आज सुबह प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में भाग लिया और अपने संबोधन में कहा कि दिव्यांग बच्चों की सेवा वही लोग कर सकते हैं, जिनके हृदय में वेदना होती है। यह वेदना जब किसी लक्ष्य को समर्पित हो जाती है, तो विषाद भी प्रसाद बन जाता है। लकडिय़ां तो चूल्हे में जलकर राख बन जाती है लेकिन जब वही लकडिय़ां यज्ञ के हवन कुंड में पहुंचती है तो शंकर के मस्तक की विभूति बन जाती है। साध्वी ऋतम्भरा ने अपने गुरु के प्रति सम्मान स्वरूप मंच के बजाय उनके चरणों में बैठकर इस महोत्सव में भाग लिया और गुरुदेव की आरती भी की। इस अवसर पर साध्वी चैतन्य सिंधु, साक्षी दीदी, महामंडलेश्वर ज्योतिर्मयानंद सहित अनेक संत-विद्वान भी मौजूद थे। संचालन डॉ अनिता शर्मा और आभार सचिव तुलसी शादीजा ने माना ।

जयघोष के बीच हुई प्राण प्रतिष्ठा- आश्रम परिसर स्थित नवनिर्मित मंदिर में चल रहे पांच दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में आज दोपहर अभिजीत मुहूर्त में जैसे ही प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई, भक्तों ने भगवान के जयघोष और गुरुदेव के जयकारों से आसमान गुंजायमान बनाए रखा। आचार्य अजय शास्त्री के निर्देशन में सुबह पुष्य नक्षत्र में वेदपाठ, मंडल पूजन एवं प्रतिमाओं की शास्त्रोक्त विधियां संपन्न हुई। नवनिर्मित मंदिर में भगवान शिव की पशुपतिनाथ स्वरूप की पंचमुखी प्रतिमा के साथ पार्वती, नंदीजी, गणेश, कच्छप आदि देवताओं की प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित की गई हैं।