
education
श्याम बिहारी सिंह @ जबलपुर।
प्वाइंट
जबलपुर पूर्व में 38008 निरक्षर
जबलपुर पश्चिम में 34608 निरक्षर
जबलपुर उत्तर में 48337 निरक्षर
जबलपुर केंट में 34454 निरक्षर
यह है स्थिति
विधानसभा-साक्षर-निरक्षर
पनागर-302854-83300
पाटन-293104-98564
बरगी-302723-59256
सिहोरा-249593-104515
जबलपुर। सरकारी स्कूलों में हजारों रुपए वेतन पाने वाले तमाम शिक्षकों की लापरवाही जगजाहिर है। ऐसे में जिला प्रौढ़ केंद्र का दावा है कि जिले के 30 हजार निरक्षरों को बिना अध्यापकों पर खर्च किए साक्षर बनाया जाएगा। जिले में 1700 अक्षर साथियों की मदद से अभियान चलाया जाएगा। दावा यह भी है कि इतने अक्षर मित्र छह महीने में ही हजारों लोगों को पढऩा-लिखना सिखा देंगे। बदले में उन्हें कोई मानदेय तय नहीं किया गया है। उन्हें सिर्फ 'अक्षर साथीÓ होने का डिजिटल प्रमाण पत्र मिलेगा। उनसे वादा किया जाएगा कि उक्त प्रमाणपत्र से सरकारी नौकरियों में आवेदन करने पर अतिरिक्त अंक मिलेंगे।
पांच लाख निरक्षर
आंकड़ों के हिसाब से जबलपुर जिले में अनुमानित पांच लाख निरक्षर हैं। अभियान के पहले चरण में 30 हजार लोगों को साक्षर बनाने के लिए चिन्हित किया गया है। अक्षर साथियों को सरकार ने एक निजी कंपनी की ओर से तैयार पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराई है। अभियान के तहत 15 साल से अधिक उम्र वाले निरक्षरों को मोबाइल ऐप से अक्षरसाथी व शाला प्रभारी की ओर से पंजीकृत किया गया है। एक अक्षर साथी को 10 लोगों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पंचायत भवन, शासकीय शाला में पढ़ाई होगी।
जागरुकता से बनेगी बात
अक्षर साथियों को किसी तरह का मानदेय नहीं देने को लेकर नवभात साक्षरता मिशन की आलोचना भी की जा रही है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इससे सफलता की उम्मीद कम है। इनका तर्क है कि हजारों रुपए वेतन पाने के बाद भी तमाम शिक्षक अपनी ड्यूटी इमानदारी से नहीं निभाते। ऐसे में बिना पैसे के कौन साक्षर बनाने का जिम्मा लेगा? इस मामले में जिला प्रौढ़ केंद्र के प्रभारी योगेश शर्मा की राय अलग है। उनका कहना है कि निरक्षरों को साक्षर बनाना, सिर्फ सरकारी आदेश नहीं है। कोशिश यह है कि लोग स्वप्रेरणा से इस काम को जिम्मेदारी समझें। जिन्हें लगता है कि उनके घर, परिवार, रिश्तेदारी में कोई निरक्षर ना रहे, वह अपने आप अक्षर साथी बनेगा। शर्मा का कहना है कि इसके पहले कुछ प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे। उनमें मानदेय भी तय किया गया था। कुछ लोगों को वह राशि कम लगती थी, इसलिए वे नहीं जुड़े। कुछ लोगों ने राशि जेब में रखी, लेकिन जिम्मेदारी को ईमानदारी और उत्साह से नहीं निभाया। इसलिए अक्षर साथियों से उम्मीद है कि वे इसे ड्यूटी की जगह सामाजिक जिम्मेदारी समझेंगे। इसलिए उत्साह से साक्षर अभियान का हिस्सा बनेंगे।
जबलपुर जिला जूझ रहा, मंडला आगे निकल गया
जबलपुर जिला फिलहाल साक्षरता के मामले में बहुत पीछे है। वहीं, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राज्य सरकार ने मंडला जिले को साक्षर जिला घोषित किया। प्रदेश का आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के बाद मंडला जिले की यह उपलब्धि जबलपुर जिले को आईना दिखा रहा है। बताया गया कि वर्ष 2011 के सर्वे में मंडला जिले में साक्षरता 68 प्रतिशत थी। जुलाई 2020 के सर्वे के अनुसार वहां लगभग सवा दो लाख लोग साक्षर नहीं थे। वहां 15 अगस्त 2020 को निक्षरता से आजादी अभियान की शुरुआत की गई थी। हाल ही में त्रिस्तीय पंचायत चुनाव में लगभग 1.5 लाख लोगों ने वोट दिया था। इसमें से महज 15 हजार ने अंगूठे का प्रयोग किया। बैंकों केडाटा के अनुसार 99 प्रतिशत उपभोक्ता हस्ताक्षर करते हैं। अब मंडला जिले का साक्षर प्रतिशत 97 प्रतिशत से अधिक है। 32 हजार ही निरक्षर हैं। इनमें अधिकतर वृद्ध हैं। कुछ दूसरे जिले में रह रहते हैं।
Published on:
20 Aug 2022 06:13 pm
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