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हरी भरी वादियों के बीच 600 साल पुरानी पिसनहारी की मढिया है जैन समाज का तीर्थ

संस्कारधानी में जैन मंदिरों का इतिहास सदियों पुराना है। यहां के दिगम्बर जैन मंदिर पिसनहारी मढ़िया की कहानी सबसे रोचक है।यह मंदिर 600 साल से भी ज्यादा पुराना है। यह जैन धर्मावलंबियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। इसकी कहानी जितनी रोचक है, उतनी ही प्रेरणादायी भी है। जैन धर्मावलंबियों के अलावा जन सामान्य के लिए भी यह पूज्य स्थल है। यहां स्थित जिनालय की प्रतिमाएं मन को आकर्षित करने वाली हैं।।

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निर्माण के लिए चक्की पीसकर धन दान करने वाली वृद्धा पर रखा गया नाम

जबलपुर।
संस्कारधानी में जैन मंदिरों का इतिहास सदियों पुराना है। यहां के दिगम्बर जैन मंदिर पिसनहारी मढ़िया की कहानी सबसे रोचक है।यह मंदिर 600 साल से भी ज्यादा पुराना है। यह जैन धर्मावलंबियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। इसकी कहानी जितनी रोचक है, उतनी ही प्रेरणादायी भी है। जैन धर्मावलंबियों के अलावा जन सामान्य के लिए भी यह पूज्य स्थल है। यहां स्थित जिनालय की प्रतिमाएं मन को आकर्षित करने वाली हैं।। विशेष बात यह है कि चक्की चलाकर मढ़िया बनवाने वाली बुजुर्ग महिला के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इस जैन तीर्थ का नाम पिसनहारी की मढ़िया रखा गया है। इसका अर्थ होता है- एक ऐसी महिला जो हाथों से चक्की में आटा पीस रही है। आसपास के खूबसूरत दृश्यों से घिरे इस मंदिर में हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

द्वार पर रखी है पिसनहारी की चक्की-
मढ़िया जी से जुड़े संजय चौधरी बताते है कि, जहां आज पिसनहारी की मढ़िया है, वहाँ कभी एक गुफा हुआ करती थी। जिसमें एक सिद्ध बाबा निवास करते थे। एक दिन एक नि:संतान बुजुर्ग महिला , जो कि घरों में चक्की से आटा पीसने का काम करती थी, बाबा जी से आशीर्वाद लेने पहुंची। उसने सिद्ध बाबा से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मांगा। तब उन्होंने कहा यहां एक मढ़िया का निर्माण कराओ, भगवान तुम्हारी मनोकामना जरूरी पूरी करेंगे। इस पर उस बुजुर्ग महिला ने करीब 35 वर्षों तक आटा पीसकर जो कमाई की थी, वह सारी रकम जैन मंदिर या मढ़िया बनवाने में लगा दी। जब मढ़िया तैयार हो गई, तो उसके मन में वैराग्य जाग गया। तब उसने चक्की भी मंदिर में दान कर दी और दीक्षा लेकर स्वयं साध्वी बन गई। उसकी चक्की आज भी मुख्य द्वार पर पिसनहारी की भक्ति को प्रदर्शित करते हुए भक्तों को प्रेरणा देने के लिए रखी गई है।


वर्णी महाराज ने बनाया गुरुकुल-
उन्होंने बताया कि उस समय दक्षिण भारत के जो भी जैन यात्री यहां से गुजरते थे, तो उनका पड़ाव पिसनहारी की मढ़िया में होता था। 100 साल पहले संत गणेश प्रसाद वर्णी महाराज ने यहां साधना करते हुए गुरुकुल की स्थापना की। यहां बच्चों को आधुनिक के साथ आध्यात्मिक शिक्षा भी दी जाती है।
सुभाष बाबू ने दिया था भाषण-

चौधरी ने बताया कि इसी स्थान पर जैन साधु वर्णी महाराज और आचार्य बिनोवा भावे का मिलन हुआ था। इसी प्रांगण में सुभाषचंद बोस व वर्णी महाराज ने देश को आजाद कराने के लिए एक ही मंच पर प्रेरणादायी भाषण दिया था।

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