
रामायण में पहले से ही हो चुका है आसाराम और रामरहीम का जिक्र
जबलपुर। श्रीमद्भागवत पुराण और तुलसीकृत रामचरित मानस... ये दो ऐसी अनूठी और महान कृतियां हैं, जिनमें समाज के हर पहलू का जिक्र है। रामचरित मानस के उत्तर कांड में तो गोस्वामी तुलसीदास जी ने खुली भविष्य वाणी की है कि कलयुग में संतों का आचरण कैसा होगा..? विशेष बात है कि यह अक्षरश: सही साबित हो रही है। आसाराम बापू हों, राम रहीम हों, बाबा रामपाल हों या फिर इस श्रेणी के अन्य कोई तथाकथित बाबा और संत...। आइए आपको भी बताते हैं कि गोस्वामीजी ने मानस में किस तरह इनका जिक्र किया है।
आडंबरधारी ही कहलाएंगेे संत
मारग सोई जा कहुं जोई भावा, पंडित सोई जो गाल बजावा।
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई, ता कहुं संत कहइ सब कोई।।
उक्त चौपाई के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने यह समझाने का प्रयास कि कलयुग में लोग अपने हिसाब से चलेंगे। नीति को कोई नहीं मानेगा, जो रास्ता जिसको लुभावना लगेगा, वह उसी तरफ चल देगा। इसमें उचित और अनुचित का विचार लोग नहीं करेंगे। दूसरा यह कि जो डींगे हांकने वाले और बढ़-चढकऱ बोलने वाले होंगे वे पंडित और ज्ञानी कहे जाएंगे। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई... यानी जो झूठी शान-शौकत दिखाएंगे। आडंबर का प्रदर्शन करेंगे, उन्हें सब लोग संत कहकर पुकारेंगे।
बड़े-बड़े बालों वाले कहलाएंगे तपस्वी
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी, कलिजुग सोई ग्यानी सो बिरागी।
जाकें नख अरु जटा बिसाला, सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।
उक्त चौपाई का अर्थ है कि जो सदाचार के पथ से भटक जाएंगे। दुरचारी और पथभ्रष्ट होंगे, कलियुग में उन्हें बैरागी और ज्ञानी माना जाएगा। जो बड़े-बड़े नाखून और बड़े-बड़े बाल रखेंगे, उन्हें तपस्वी माना जाएगा। ऐसे कथित संत-महंगों की कलयुग में बड़ी प्रसिद्धि रहेगी। इनमें तपस्चर्या के कोई लक्षण नहीं होंगे, फिर भी ये परम तपस्वी कहलाएंगे।
धनाड्य होंगे संत और तपस्वी
बहु दाम संवाहरिं धाम जती,
बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।
तपसी धनवंत दरिद्र गृही,
कलि कौतुक तात न जात कही।।
उक्त पंक्तियों से समझाया गया है कि कलयुग में साधु-संत खूब सारा धन खर्च करके अपने घर और महलनुमा कथित आश्रमों को सजाएंगे-संवारेंगे। कलयुग के साधु-संत खूब पैसा लगाकर अपना घर सजवायेंगे और उनमें वैराग्य बिलकुल भी नहीं होगा। साधु-संत धन बटोरने के लिए लोभी वृत्ति के कारण धनवान होंगे और जिन्हें पैसों की वास्तव में जरूरत होगी वे और भी गरीब हो जायेंगे। मायावी संतों के ऐसे बड़े-बड़े आश्रम होंगे, जिनमें वैभव के सभी साधन मौजूद रहेंगे।
अभक्ष्य का भी भक्षण
असुभ बेष भूषन धरें, भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।।
वैदिक संहिता में संत, महंत और त्यागियों के लिए अलग-अलग आहारचर्या निर्धारित की गई है। उनके लिए साधारण वेशभूषा रखने के साथ बिल्कुल ही सादा भोजन गृहण करने के नियम बनाए गए हैं। लेकिन कलयुग के लिए कहा गया है कि इसमें अशुभ और अमंगल वेश रखने वाले, भक्ष्य-अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य भी) सब कुछ खा लेने वाले लोग योगी सिद्ध और पूज्यनीय माने जाएंगे।
खुद करें पहचान
गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस के माध्यम से लोगों को यही चेताने का प्रयास किया है कि वे अच्छे-बुरे या संत और असंत की पहचान खुद करें, इसके बाद ही किसी पर विश्वास करें। मानस में यती, योगी, बिरागी, संत, महंत सभी की मर्यादाओं के बारे में भी बताया गया है। त्याग, तपस्या, संतोष, परोपकार, अपरिग्रह, साधना आदि को उनके लक्षण बताया गया है। घास-पूस की झोपड़ी में अभावों के बीच रहकर भी मुस्कुराते हुए जनमंगल के कार्य करना संत का स्वभाव माना गया है। आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि आज क्या हो रहा है। मानस में लिखी गोस्वामीजी की उक्त पंक्तियां कितनी चरितार्थ हो रही हैं। दुराचार के आरोप में फंसे आसाराम, रामपाल, राम रहीम जैसे अन्य संत इसका जीवंत उदाहरण हो सकते हैं। ये तो वे हैं, जो कानून के शिकंजे में आ चुके हैं, अभी ऐसे और भी कई तथाकथित संत हैं, जो संत की मर्यादा को कलुषित और कलंकित कर रहे हैं। सभी को इनसे सावधान रहना चाहिए।
Published on:
03 May 2018 10:28 pm
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