22 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

शंकराचार्य ने साईं बाबा की पूजा को बताया हिंदू विरोधी, लड़ी आजादी की लड़ाई

शंकराचार्य ने साईं बाबा की पूजा को बताया हिंदू विरोधी, लड़ी आजादी की लड़ाई

3 min read
Google source verification
shankaracharya swaroopanand saraswati

shankaracharya swaroopanand saraswati

नरसिंहपुर/ ब्रह्मलीन जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के जीवन की शुरूआत बहुत क्रांतिकारी अंदाज में हुई। महज 9 साल की उम्र में ही उन्हें कक्षा भर की नहीं बल्कि धार्मिक ग्रंथ भी कंठस्थ हो गए थे। इसी से उनका नाम पोथीराम उपाध्याय पड़ गया है। जिसका अर्थ था शास्त्रों को याद रखने वाला। उनकी इसी योग्यता के चलते परिवार ने काशी पढ़ने के लिए भेज दिया। वे वहां अध्ययन के साथ ही आजादी के आंदोलन में भी सक्रिय हो गए। यहीं से शंकराचार्य के जीवन में बड़ा बदलाव आया।

ग्रन्थों को किया था कंठस्थ, आजादी के आंदोलन में कहलाए क्रांतिकारी साधु
पीएम मोदी समेत कई नेताओं ने जताया दुख

आजादी के आंदोलन के निर्णायक साल 1942 में शंकराचार्य स्वरूपानंद 19 साल के थे। क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी और दमन से वे इतने उदविग्न हुए कि सीधे आंदोलन का हिस्सा बन गए। वे भगवा कपड़े पहन साधु वेश में वंदे मातरम का गायन करते हुए सभा-सम्मेलनों में शिकरत करने लगे। पूरे देश में उनकी पहचान क्रांतिकारी साधु के रूप में होने लगी। तभी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 महीने तक उन्हें वाराणसी जेल में रखा गया। इसके बाद 6 महीने तक वे मध्यप्रदेश की जेल में रहे। लेकिन आजादी के आंदोलन और लोकतंत्र बहाली में वे तभी तक शामिल रहे जब तक देश आजाद नहीं हो गया। इसके बाद वे फिर संन्यास की ओर ध्यान लगाना शुरू किया और 1950 में दंडी दीक्षा ग्रहण की।

राम मंदिर आंदोलन का बने हिस्सा

धार्मिक जनजागरण के साथ ही शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती राम मंदिर निर्माण के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। कोर्ट से लेकर भक्तों के बीच वे इस आंदोलन में लगातार सक्रिय रहे। तो राजनीतिक नेताओं को इसे लेकर कटघरे में भी खड़ा करते रहे। शंकराचार्य स्वामी स्परूपानंद सरस्वती ने राम जन्मभूमि न्यास के नाम पर विहिप और भाजपा को घेरा था। वे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य के रूप में वासुदेवानंद सरस्वती को जगह देने पर भी आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने चार फैसलों में वासुदेवानंद सरस्वती को न शंकराचार्य माना और न ही सन्यासी माना है। ज्योतिर्मठ पीठ का शंकराचार्य मैं हूं। ऐसे में प्रधानमंत्री ने ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य के रूप में वासुदेवानंद सरस्वती को ट्रस्ट में जगह देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की है।

बेबाकी ने पैदा किए विवाद

23 जून 2014 को आयोजित धर्म संसद में शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने साईं बाबा पर बयान दिया था। उन्होंने साईं की पूजा को हिंदू विरोधी बताते हुए कहा था कि उनके भक्तों को भगवान राम की पूजा, गंगा में स्नान और हर-हर महादेव का जाप करने का अधिकार नहीं है। इस धर्म संसद में सर्वसम्मति से साईं पूजा का बहिष्कार करने का ऐलान किया गया था। महाराष्ट्र में सूखे का कारण साईं की पूजा को बताया था।

महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति मिलने पर शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा था कि महिलाओं को शनि के दर्शन नहीं करना चाहिए। शनि की पूजा से उनका अनिष्ट हो सकता है। उन्होंने कहा था कि शनि दर्शन से महिलाओं का हित नहीं होगा।

2013 में केदारनाथ में आई त्रासदी पर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा था- लोगों ने धर्मस्थलों को पिकनिक और हनीमून स्पॉट बना दिया है, इस कारण त्रासदी हो रही है।

अप्रेल 2016 में उन्होंने केदारनाथ और उत्तराखंड में आई आपदा के कारणों पर बात करते हुए कहा था कि गंगा में लगातार बनाए जा रहे बांध, अलकनंदा नदी में बांध बनाकर धारी देवी के मंदिर को डुबो देना और तीर्थ यात्रियों का पवित्र स्थल पर आकर होटलों में भोग-विलास करना त्रासदी के प्रमुख कारण हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन पर शोक जताते हुए उनके अनुयायियों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा- सनातन संस्कृति व धर्म के प्रचार-प्रसार को समर्पित उनके कार्य सदैव याद किए जाएंगे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट किया- शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती सनातन धर्म के शलाका पुरुष एवं संन्यास परम्परा के सूर्य थे। वहीं, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन को संत समाज की अपूर्णीय क्षति बताया है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने कहा- शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने धर्म, अध्यात्म व परमार्थ के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।