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बुजुर्गों की शाम वाली सैर पर भी नजर, 10-10 रुपए टैक्स वसूल कर निगम बनना चाहता है मालामाल

जबलपुर नगर निगम की फिर दिखी मनमानी, गुलौआ ताल के पाथवे पर घूमने के लिए लिया जाने शुल्क    

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बुजुर्गों की शाम वाली सैर पर भी नजर, 10-10 रुपए टैक्स वसूल कर निगम बनना चाहता है मालामाल

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जबलपुर। 'बच्चे खेलें कहां, बुजुर्ग टहलने कहां जाएं? गुलौआ ताल में भी नगर निगम टैक्स वसूल रहा है। नगर निगम व्यवसायिक संस्था नहीं है फिर भी हर जगह टैक्स वसूली क रना कहां तक सही है? निगम प्रशासन लोगों के साथ तानाशाही कर रहा है।Ó यह शिकायत करते हुए क्षेत्रीयजन ने निगम प्रशासन पर तानाशाही का आरोप लगाया। दोपहर से लेकर शाम तक 10-10 रुपए प्रवेश शुल्क व वाहन शुल्क वसूले जाने के कारण गुलौआताल परिसर में प्रवेश नहीं कर सके बाहर बैठे बुजुर्गों ने नाराजगी जताई। गुलौआताल में प्रवेश शुल्क लिए जाने के विरोध में क्षेत्रीयजन ने हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। इसके तहत 51 मीटर लम्बे कागज के रोल पर लोगों के हस्ताक्षर कराकर अभियान शुरू किया गया। प्रशासन से मांग की गई कि गुलौआ तालाब में लगने वाला प्रवेश शुल्क बंद कराया जाए। गुलौआ तालाब परिसर की बंद लाइट चालू की जाए। गुलौआ तालाब की सफ ाई व्यवस्था में सुधार किया जाए। परिसर में 24 घंटे सुरक्षा गार्ड की तैनाती की जाए। तालाब का व्यवसायीकरण बंद किया जाए। सभी मांगों को लेकर मंगलवार को धरना-प्रदर्शन किया जाएगा।
ये थे शामिल
पूर्व पार्षद संजय राठौड़ व क्षेत्रीयजनों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया। इसमें कमला नेहरू ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष गणेश चौकसे, अरुण जैन, शिवम सैनी, अमित विश्वकर्मा, अंकुर साहू, मुकेश पटेल, सौरभ सिंह ठाकुर, रूपेश पाठक, नितिन पटेल, बाबा, नितिन मिश्रा, अरुण जैन शामिल थे। वहीं, नगर निगम के उद्यान अधिकारी आदित्य शुक्ला ने बताया कि गुलौआताल को शहरवासियों के लिए ही विकसित किया गया है। मेंटेंनेंस पर खर्च होने वाली राशि की व्यवस्था के लिए प्रशासन ने न्यूनतम शुल्क निर्धारित किया है। न्यूनतम प्रवेश शुल्क होने पर असामाजिक तत्वों को भी आने से रोक पाते हैं, अन्यथा ऐसे लोग आकर अव्यवस्था फैलाते हैं। परिसर की सामग्री से तोड़ फोड़ भी करते हैं। हालांकि, गेट पर शुल्क सम्बंधी निर्देश पट्टिका रखकर जिम्मेदार यह भूल गए कि इन बुजुर्गों के प्रति जितनी जिम्मेदारी उनके परिजन की है, वैसी ही जिम्मेदारी निगम प्रशासन की भी है। यदि इन्हें मुफ्त में घूमने की भी जगह नहीं मुहैया हो पा रही है, तो यह सिस्टम के गाल पर तमाचा है। इनके प्रति जिम्मेदारी नहीं समझना भी एक तरह का अपराध है। यह कोई नहीं कह रहा है कि व्यवस्थाएं बनाने के लिए पार्क, गार्डन, तालाब, नदी के तटों पर किसी तरह का शुल्क न लिया जाए। लेकिन, बुजुर्गों को भी शुल्क के दायरे में लाना पड़े, तो मानना होगा कि निगम का कंगाल हो गया है। इस तालाब का सौंदर्यीकरण हुआ था, तब इन बुजुर्गों की बाछें खिल गई थीं। उन्हें लगा था कि फुर्सत के कुछ पल यहां बिताएंगे। टैक्स लगाने के पहले जिम्मेदारों ने एक बार भी नहीं सोचा कि करोड़ों खर्च के बाद भी इस तालाब की फुहारे क्यों बंद हैं? तालाब का पानी सड़ांध क्यों मारने लगा है? बैठने तक की जगह क्यों नहीं है?