
balancing rock of india
जबलपुर। मदन महल पहाड़ी से अतिक्रमण हटाने के बाद शहर में संतुलित शिलाओं की संख्या बढकऱ छह हो गई है। जानकारों के अनुसारशहर की सभी बैलेंसिंग रॉक्स को सहेजने और उनके प्रमोशन की दरकार है। यदि ऐसा होता है तो सेल्फी के इस युग में इन शिलाओं के आस-पास पर्यटकों की भीड़ लग जाएगी। ग्रेनाइट की इन शिलाओं के संतुलन को भूकम्प भी नहीं डिगा सका। इन बैलेसिंग रॉक्स को जिम्मेदार एजेसिंयों की ओर से अभी तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। यही कारण है कि इनमें से अधिकतर के पास या तो अतिक्रमण हो गया या उनके आसपास प्राकृतिक रूप से मौजूद विशालकाय चट्टानों को ध्वस्त कर मकानों का निर्माण कर लिया गया।
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बैलेंसिंग रॉक्स को सहेजने और नम्बरिंग के साथ प्रमोशन की भी दरकार
अचम्भित कर देती हैं संतुलित शिलाएं
ये हैं शिलाएं
शिला नम्बर : 1
शारदा चौक से शारदा मंदिर मार्ग पर तक्षशिला इंजीनियरिंग कॉलेज के पास यह सबसे बड़ी बैलेंसिंग रॉक है। यहां दो शिलाओं के संतुलन को देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक आते हैं।
शिला नम्बर : 2
शारदा मंदिर की पहाड़ी और मदन महल पहाड़ी के बीच स्थित यह शिला अतिक्रमण हटाने के बाद सामने आई। फिलहाल पहुंच मार्ग दुर्गम है। इसे सुव्यवस्थित करना होगा।
शिला नम्बर : 3
पिसनहारी की मढिय़ा वाली पहाड़ी पर स्थित दो शिलाओं के संतुलन को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो विशालकाय शिला पर बैठे बड़े पक्षी की चोंच हो।
शिला नम्बर : 4
शास्त्री नगर में बाजनामठ मंदिर मोड़ से पहले सडक़ के दायीं ओर यह शिला स्थित है। आकार के लिहाज से यह शहर की दूसरी सबसे बड़ी संतुलित शिला है। इनके आसपास की प्राकृतिक चट्टानों को अवैध तरीके से नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
शिला नम्बर- 5
शक्ति भवन से कुछ दूर ठाकुर के ऊ पर की ओर क्रम से दो संतुलित शिलाएं हैं। आकार में छोटी इन शिलाओं का संतुलन भी अद्भुत है। लोग इन शिलाओं को एकटक देखते रह जाते हैं।
शिला नम्बर : 6
सिंधी कैम्प टनटनिया पहाड़ी पर भी शिलाओं का संतुलन अद्भुत है। इन्हें देखकर ऐसा आभास होता है कि चट्टान कभी भी ढह सकती है, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग शिला को इसी स्वरूप में देखते आ रहे हैं।
सभी चट्टाने की हैं। मुख्य शिला 16 फुट लम्बी और 8 फुट ऊंची है, जो छह इंच की धुरी पर टिकी है। इसका वजन लगभग 40 टन है। गुरुत्वाकर्षण के कारण पूरा संतुलन एक बिंदु पर केंद्रित है।
संजय वर्मा, स्ट्रक्चर इंजीनियर, प्लानर
&भू-गर्भ शास्त्रियों के अनुसार ये चट्टानें लगभग साढ़े पांच करोड़ साल पुरानी हैं। संभवत: ज्वालामुखी का लावा ठंडा होने पर ऐसा आकार बना होगा। इनके संतुलन का एक बड़ा कारण ग्रेनाइट की चट्टानों की मजबूती भी है।
विकास दुबे, स्ट्रक्चर इंजीनियर
Published on:
15 Oct 2018 12:22 pm
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