13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कचरे से बिजली बनाने वाली कम्पनी का मायाजाल देखकर सन्न रह जाएंगे

जबलपुर शहर में जगह-जगह कचरे के ढेर, कठौंदा में दूसरे राज्यों से मंगाना पड़ रहा कचरा      

3 min read
Google source verification
kachra

kachra

श्याम बिहारी सिंह@जबलपुर।
शहर के गली-मोहल्लों में जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं। खाली प्लॉट, सड़कों के किनारे कचरा डम्प किया जा रहा है। लोगों के घरों से भी रोजाना कचरा नहीं उठता। शहर के कई हिस्सों के लोग कचरा गाड़ी का इंतजार ही करते रहते हैं। गाड़ी कब निकल जाती है, पता नहीं चलता। यह सब दृश्य गवाही दे रहे हैं कि 'डोर-टू-डोरÓ कचरा कलेक्शन की व्यवस्था फेल है। कठौंदा के कचरा प्लांट को पर्याप्त कचरा नहीं मिल रहा। प्लांट चलाने वाली एक्सल ग्रुप को रोजाना जरूरी कचरा दूसरे राज्यों से मंगाना पड़ रहा है। कचरे से बिजली बनाने का प्लांट लगा, तो इसे शहर की बड़ी उपलब्धि माना गया। निगम के जिम्मेदारों का दावा था कि यह प्लांट शहर के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
यह है स्थिति
-600 टन कचरे की प्लांट में रोजाना जरूरत
-300 टन उपलब्ध कचरा
-250 कुल वाहन लगे हैं कचरा इक_ा करने में
-6 से 7 मेगावाट मौजूदा बिजली उत्पादन
-11.7 मेगावाट प्लांट की बिजली उत्पादन की क्षमता
-20 टन कचरा रोजाना गुजरात से आता है
-20 टन कचरा इंदौर व भोपाल से आता है
-40 टन कचरा प्रयागराज, वाराणसी, कानपुर आता है
-35 टन पुराने कचरे का रोजाना हो रहा इस्तेमाल
-20 रुपए देता है एक्सल ग्रुप कचरे के एवज में
-06 रुपए में बेची जाती है प्लांट से बिजली
बन नहीं रही बात
कठौंदा के 'वेस्ट टू एनर्जी प्लांट को हर रोज 600 टन कचरा चाहिए। लेकिन, शहर से 300 टन कचरा ही प्लांट पहुंच रहा है। किल्लत दूर करने के लिए राजधानी भोपाल और इंदौर के अलावा उप्र के प्रयागराज, बनारस, लखनऊ और गुजरात के अहमदाबाद, बड़ोदरा और सूरत जैसे शहरों से रोजाना लगभग 100 टन कचरा मंगाया जा रहा है। कचरे से बिजली बनाने के लिए प्लांट लगाना शहर के लिए बड़ा कदम था। दावा था कि इससे शहर कचरा मुक्त हो जाएगा। रानीताल में बना कचरे का पहाड़ हट जाएगा। कॉलानियों में डस्टबिन रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कचरा सीधे घरों से निकलकर निगम के वाहनों मेें जाएगा। वहां से कठौंदा प्लांट पहुंच जाएगा। इसके लिए निगम ने डोर-टू-डोरÓ कचरा कलेक्शन व्यवस्था लागू की। प्लांट में बिजली बनने लगी, तो नगर निगम ने कई पुरस्कार भी जीते। लेकिन, बाद में व्यवस्था बेपटरी होती गई।
कंपनी पर आरोप
शहर में कचरे की कमी का गणित उलझाऊ है। कुछ लोग प्लांट चलाने वाले एस्सल गु्रप पर ही आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि ग्रुप 'डोर-टू-डोरÓ कचरा उठा नहीं रहा। ठेका प्रक्रिया के पहले नगर निगम के अधिकारियों का कहना था कि शहर में हर रोज तकरीबन 400 टन कचरा निकलता है। ऐसे में सवाल है कि आखिर पांच साल बाद कचरा कम कैसे हो गया? कंपनी आखिर कैसे कह रही है कि 300 टन कचरा ही मुश्किल से मिल रहा है। जबकि, शहर में सफाई के नाम पर हर साल करोड़ों का भुगतान भी होता रहा। नगर निगम और एस्सल ग्रुप में अनुबंध है। ग्रुप ने कठौंदा में लगभग 178 करोड़ रुपए की लागत से प्लांट लगाया है। 20 साल तक प्लांट चलाकर वह अपनी लागत निकालेगा। साथ में मुनाफा कमाएगा। इसके बाद प्लांट का स्वामित्व निगम के हाथों में आ जाएगा। मप्र सरकार ने 20 करोड़ का अनुदान भी दिया था। एस्सल समूह ने निगम से प्रति टन कचरा खरीदने के लिए 20 रुपए तय किए हैं। इससे बनने वाली बिजली एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी को छह रुपए प्रति यूनिट की दर से बेचने का करार किया है। एस्सल समूह को ही कठौंदा में जमा पुराने कचरे का निष्पादन भी करना है। जानकारों के अनुसार देखा जाए, तो ठेका कंपनी दोनों तरफ से कमाई कर रही है। इसके बाद भी कचरा नहीं उठता।

सभी जोन में कचरा कलेक्शन व परिवहन की व्यवस्था में निगरानी व्यवस्था दुरुस्त की जाएगी। ताकि, कहीं भी कचरे का ढेर न लगे।
भूपेंद्र सिंह, स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निगम

हमारे घर के आस-पास कचरे फैला रहता है। कचरा गाड़ी कब आती है, पता नहीं चलता। घर में ही कचरा रखना पड़ता है।
प्रीति ताम्रकार, कोतवाली की रहवासी

शहर में चारों तरफ गंदगी का आलम है। अब तो हालत यह है कि जगह-जगह कचरा डम्प भी यिका जाने लगा है।
आलोक सराफ, हनुमानताल के रहवासी