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#Health : 3 लाख लोगों की होगी जेनेटिक काउंसलिंग, सिकिलसेल व थैलेसीमिया का चलेगा पता

3 लाख लोगों की होगी जेनेटिक काउंसलिंग, सिकिलसेल व थैलेसीमिया का चलेगा पता

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sickle cell and thalassemia

जबलपुर. थेलेसीमिया, सिकलसेल एनीमिया से पीड़ित जबलपुर, मंडला, डिंडोरी के जनजातियों की जेनेटिक काउंसिलिंग होगी। नवजात से 40 साल तक की उम्र के लोगों की काउंसलिंग, स्क्कीनिंग के साथ ही ब्लड सैम्पल लेकर बीमारी की जांच की जाएगी। इससे जेनेटिक बीमारियों के रोकथाम और पीड़ितों के इलाज में मदद मिलेगी।

जेनेटिक बीमारियों को पहचानने आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में 0 से 40 साल तक के लोगों की जांच होगी

मेडिकल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार डॉ. पुष्पराज बघेल ने बताया कि जेनेटिक काउंसलिंग की शुरुआत डिंडोरी जिले के बड़ागांव से की जाएगी। इसके बाद अन्य जनजातीय बाहुल्य इलाकों को प्रोजेक्ट में शामिल कर तीन लाख परिवारों को कवर किया जाएगा। वनवासी कल्याण, जनजातीय कल्याण, एनटीपीसी और मेडिकल यूनिवर्सिटी की टीम मिलकर काम करेंगी। एमयू प्रशासन के अनुसार जेनेटिक बीमारियों से पीड़ित जनजातीय बाहुल्य इलाकों में पीड़ितों की पहचान कर उनके इलाज पर फोकस किया जाएगा। उन्हें लोकल हेल्थ सिस्टम से जोड़ा जाएगा। इसके साथ ही आने वाली पीढ़ियों में जेनेटिक सुधार हो सके इसके लिए भी ये टीम काम करेंगी।

जांच से पकड़ में आती है बीमारी

हीमोग्लोबनो पैथी व जीन की जांच से इन घातक बीमारियों का पता लगाया जा सकता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के शिशु रोग विभाग में सिकलसेल एनीमिया का क्लीनिक संचालित है, जहां स्क्रीनिंग की जाती है। इसके बाद आईसीएमआर से हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफॉरेसिस जांच कराई जाती है। बच्चों में सिकलसेल ट्रेट होने पर उनका हेल्थ कार्ड बनाया जाता है। बड़ी संख्या में लोग केवल बीमारी के कैरियर होते हैं, उन्हें स्वयं को इन बीमारी से ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचता है।

ज्ञात हो कि इस जांच में माइक्रोस्कोप से ब्लड का सैम्पल देखने पर सिकल (अर्धचंद्राकार) आकार की लाल रक्त कोशिकाएं और नष्ट हुई लाल रक्त कोशिकाओं के टुकड़े दिखाई देते हैं। इसके अलावा हीमोग्लोबिन इलेक्क्ट्रोफ़ोरेसिस, अन्य ब्लड टेस्ट भी किया जाता है।

जनजातीय बाहुल्य जबलपुर, मंडला, डिंडोरी इलाकों में तीन लाख लोगों की जेनेटिक काउंसलिंग की जाएगी। थैलेसीमिया सिकलसेल एनीमिया की पहचान कर उनका इलाज किया जाएगा। इसके साथ ही आने वाली पीढ़ी में जेनेटिक सुधार हो सके, जिससे वे इन जेनेटिक बीमारियों से पीड़ित न हों इस पर भी काम किया जाएगा।

डॉ. अशोक खंडेलवाल, कुलपति, मेडिकल यूनिवर्सिटी