
भेड़ाघाट
जबलपुर। भेड़ाघाट की संगमरमरी वादियों में कार्तिक माह की पूर्णिमा से पांच दिन तक लगने वाला कार्तिक मेला अब सिमट कर एक दिन का रह गया है। सरकारी उपेक्षा का शिकार यह मेला प्राथमिक व माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम से भी हटा दिया गया है। इतना ही नहीं सरकारी केलेण्डर से भी यह मेला गायब हो गया। यही वजह है कि इस मेले के महत्व को युवा पीढ़ी अब उतना नहीं समझती। इसके बावजूद यह मेला अब भी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और सभ्यता का परिचायक बना हुआ है। लोग अब भी बड़ी संख्या में इस मेले में पहुंचते हैं। इस बार भी मेला आयोजन के लिए तैयारियां आरम्भ हो चुकी हैं। क्षेत्रीय व्यापारी व नागरिक मेले के लिए तैयारियों में लगे हैं।
रहती थी छुट्टी
भेड़ाघाट मेले के अवसर पर स्थानीय अवकाश रहता था। यह मेला पहले सरकारी कैलेंडर का हिस्सा हुआ करता था। इतना ही नहीं भेड़ाघाट मेला मध्यप्रदेश बोर्ड की पुस्तकों में पांचवीं व आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा था। परीक्षा में भेड़ाघाट मेला पर निबंध लिखने आता था। दो दशक पहले प्रदेश शासन ने मेला की उपेक्षा शुरू कर दी। शासकीय कैलेंडर से और पाठ्य पुस्तक से मेला हटा दिया गया। ऐतिहासिक मेले को व्यवस्थित स्वरूप देने भी शासन व प्रशासन के स्तर पर प्रयास नहीं हुए। जिसके कारण मेला का स्वरूप सिमटते जा रहा है।
पांच दिन भरता था मेला
नर्मदा के सबसे खूबसूरत तट भेड़ाघाट में पहले पांच दिन का कार्तिक मेला भरता था। इतिहासकार आनन्द राणा बताते हैं कि इस मेले में न केवल प्रदेश बल्कि देशभर से लोग व्यापार व खरीदारी के लिए बैलगाड़ी, तांगा गाड़ी व अन्य साधनों से आते थे। पांच दिन एक जैसी भीड़ रहती थी। क्षेत्रीय निवासी संजय लोधी का कहना है कि उनके बचपन में इस मेले में दूर दूर के लोग आते थे। बाहर के व्यापारी भी आकर पांच दिन तक डेरा डालते थे।
ग्रामीण संस्कृति की झलक
भेड़ाघाट के कार्तिक मेले में क्षेत्रीय ग्रामीण संस्कृति की साफ झलक नजर आती है। भेड़ाघाट निवासी बुजुर्ग श्यामलाल ठाकुर बताते हैं कि इस मेले में उपयोगी सामान मिलते हैं। खानपान की देहाती वस्तुएं व फल भी बिकते हैं। लोकनृत्यों व रहट झूलों की धूम रहती है। मेले में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक मनोरंजन व खरीदारी के लिए आते हैं। आसपास के लोगों से मेलमिलाप का भी यह मेला अच्छा जरिया है।
Published on:
21 Nov 2023 09:07 pm
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