
swami girishanand ji maharaj
जबलपुर। नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो, तुमको देखने वाला हर कोई मोहित हो जाता है। क्या बात है, तुममें ये तो मैं कई बार पूछ चुका हूं, पर तुम मुस्कुराकर बात को टाल जाती हो। तुमने तो पूरी धरती पर अमृत पान कराने की ठानी है। सो उल्टी दिशा ही सही निकल पड़ी हो। ये जो नर्मदा भक्त तुम्हारे घाट पर आते हैं न, देखकर तुमको बड़े इतराते हैं। क्यों न इतराएं आखिर तुम इनकी मां हो। ऐसी मां जो केवल देना जानती है। बस ऐसे एक दिन मुझे भी अपनी गोद में बैठा लेना चिर निद्रा में जब मैं सोने आऊं... ये शब्द नर्मदा पुत्र और नर्मदा के प्रति आगाध श्रद्धा रखने वाले साहित्यकार, चित्रकार अमृत लाल वेगड़ ने साल 2013 में पत्रिका के मां को बचा लो संकल्प अभियान का शंखनाद करते हुए साकेतधाम में कहे थे। किसे पता था वो सच में नर्मदा की गोद में सोने के लिए चले जाएंगे। शुक्रवार 6 जुलाई 2018 को उन्होंने देह त्याग मां नर्मदा का आंचल थाम लिया है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे।
नर्मदा चिंतक व मंगलचंडी मंदिर के संस्थापक स्व. पं द्वारिकानाथ शुक्ल शास्त्री ने कहा था कि अमृत लाल वेगड़ की लेखनी में स्वयं नर्मदा की व्यथा कथा है। मां नर्मदा ने स्वयं उनको साक्षात्कार दिया था। जिसके बाद उन्होंने उसका वर्णन अपने साहित्य में किया। उनके लिखे साहित्य में ये बातें प्रमाणित भी होती हैं। इसके साथ ही अन्य संतों ने भी उन्हें संतत्व वाला साधारण मनुष्य बताया है। जिसमें संत की भावना और आमजन सा भोलापन सदैव रहा है।
प्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रकार और नर्मदा चिंतक अमृतलाल वेगड़ नहीं रहे, लेकिन उनका अमृत मय कृतित्व नर्मदा की लहरों की तरह अमर व जीवंत रहेगा..। वेगड देश के प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के उन प्रसिद्ध साहित्यकारों और चिंतकों में शामिल हैं, जिन्होंने न केवल पर्यावरण के लिए चिंतन किया बल्कि खुद नर्मदा परिक्रमा यात्रा करके नर्मदा के आंचल में मौजूद जैव विविधता और उसके आध्यात्मिक पक्ष को अपने अंतरमन में झांककर दुनिया के सामने पेश किया। उसे लिपिबद्ध किया। श्री वेगड़ के निधन का समाचार से संस्कारधानी ही नहीं प्रदेश भर में उनके शुभ चिंतक स्तब्ध हैं। वास्तव में संस्कारधानी ने फिर एक और चतुर चितेरे को खो दिया। डी-लिट की उपाधि प्राप्त वेगड़ को राष्ट्रीय स्तर के अनेक सम्मान मिले, हालांकि उनका कद इन सम्मानों से भी कहीं ऊंचा था। उनकी कृतियों और कृतित्व के लिए उन्हें सदा याद किया किया जाएगा।
अपूर्णीय क्षति- स्वामी गिरिशानंद सरस्वती
नर्मदा का यदि किसी ने प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया है तो वह संस्कारधानी का पुत्र अमृत लाल वेगड़ है। उन्होंने न केवल उनका चिंतन किया, बल्कि पग पग उसकी धाराओं के साथ कदम ताल किया। वेगड़ जी ने लोगों को नर्मदा के दर्द से रूबरू कराया है। वे रासायनिक खादों के उपयोग पर चिंतन जाहिर कर चुके थे। उन्होंने पत्रिका के मां को बचा लो नर्मदा संकल्प अभियान का शंखनाद कर प्रदेश में विसर्जन कुंडों को स्थापित करने का आशीर्वाद दिया था। जो संकल्प पूरा हुआ। संत समाज उनकी कमी हमेशा महसूस करेगा। मां नर्मदा उन्हें अपने गोद में स्थान देंगी। उनके बताए रास्ते पर चलकर मां की सेवा निरंतर जारी रहेगी।
सफर न रुके- समर्थ भैयाजी सरकार
मां नर्मदा को अपना जीवन समर्पित करने वाले अमृत लाल वेगड़ ने नर्मदा मिशन को ऊर्जा प्रदान की है। उन्होंने कहा था कि यह मिशन मेरे सपनों को पूरा करेगा ऐसी मुझे पूरी उम्मीद है। हमारे बीच आज वो भले ही न हों, लेकिन नर्मदा की लहरें उनकी याद हमेशा दिलाती रहेंगी। मां नर्मदा को बचाने के लिए जो अभियान उन्होंने शुरू किया था, वो सफर न रुके हम यही प्रयास करें। वेगड़ जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम मां नर्मदा के तटों, घाटों को निर्मल व स्वच्छ रखने का संकल्प लें। आज नर्मदा का पुत्र उनके आंचल में चिर निद्रा में सो गया है, मां उन्हें अपनी शरण में स्थान दें।
वो हमेशा नर्मदा प्रेमियों के प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।
जब बोले थे अमृत लाल वेगड़- नर्मदा तुम कितनी सुंदर हो...
अमृतलाल वेगड़ का जन्म 3 अक्टूबर 1928 में जबलपुर में हुआ। 1948 से 1953 तक शांति निकेतन में कला का अध्ययन किया। खंडों में नर्मदा की पूरी परिक्रमा की। नर्मदाा पदयात्रा वृत्तांत की तीन पुस्तकें हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला अंग्रेजी और संस्कृत में प्रकाश?ित हुई हैं। गुजराती और हिन्दी में साहित्य अकादमी पुरस्कार एवं महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार जैसे अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए। अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा और सहायक नदियों की 4000 क?िलोमीटर से भी अधिक की पदयात्रा की।वे पहली बार वर्ष 1977 में 50 वर्ष की अवस्था में नर्मदा की पदयात्रा में निकले और 82 वर्ष की आयु तक जारी रखा। सौंदर्य की नदी नर्मदा उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है।
Published on:
06 Jul 2018 05:07 pm
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