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यहां 45 साल से बापू की याद में भरता है मेला

चार दशक से चल रही परंपरा, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि में होते हैं आयोजन

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awkash garg

Jan 30, 2016

अवकाश गर्ग @जबलपुर। शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा कुछ इन्हीं पंक्तियों को प्रदेश में कोयला उत्पादन करने वाले शहडोल जिले के लोगों ने सार्थक किया है। जिले के एक छोटे से कस्बे बुढ़ार की रुंगटा कॉलरी में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का स्मरण लोग मेले लगाकर करते हैं। आसपास गांव नहीं बल्कि जिले से लोग यहां महात्मा गांधी को श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचते हैं।

चार दशक से भी अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी बापू के अनुयायियों ने बरकरार रखी है। इसकी शुरुआत अमरकंटक में मां नर्मदा की सरस सलिल धरती पर 1970 के दशक एक कोयला व्यापारी ने शुरू की, जिसे एक पर्व के रूप में आज भी लोग मना रहे हैं। लोगों की मानें तो बापू यहां स्वर्गवास के बाद राख के रूप में भले ही लाए गए हों, लेकिन आज भी उनके सात्विक विचार और देश प्रेम के धर्म को लोग अहसास करते हैं।
Gandhi Ghat Rungta new
ऐसे हुई मेला की शुरुआत
वर्तमान में मेला समिति के प्रभारी व इसके संस्थापक सदस्य रहे स्व. रामविलास राय के पुत्र कामाख्या राय ने बताया कि 1970 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अस्थियों से भरी तीन पोटली अमरकंटक लाई गई थी जिसका कुछ अंश क्षेत्र के कोयला व्यापारी महावीर रुंगटा ने अपने साथ लाया और कॉलरी कॉलोनी में बहने वाली रुंगटा नदी पर उसे विसर्जित किया। इसके बाद से रुंगटा कॉलोनी के निकट बहने वाली इस नदी के घाट पर बापू की याद में ना सिर्फ मेला लगता है।

भजन-कीर्तन के साथ मनन
यहां शहडोल, बुढ़ार, धनपुरी व अमलाई के अलावा अनूपपुर, उमरिया सहित छत्तीसगढ़ से भी बापू के अनुयायी हर वर्ष बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। बापू घाट के नाम से प्रसिद्ध इस स्थल पर लोग भजन-कीर्तन के साथ उनके आदर्शों को याद करते हैं। इस परंपरा को संस्थापक सदस्य स्व. रामविलास राय की पत्नी शिव कुमारी, पुत्र अविनाश व कामाख्या राय ने आज भी जीवंत रखा है। इस परंपरा को बढ़ाने के लिए एसईसीएल (साउथ ईस्ट कोल फील्ड लिमिटेड कंपनी) ने भी महती भूमिका निभाई है।

अस्पृश्यता व अहिंसा को देते पाठ
बापू घाट में पहुंचने वाले सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि उनके आदर्शों को जानने भी यहां पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में यहां पहुंचने वाले बापू घाट पर महात्माजी की प्रतिमा के समक्ष अस्पृश्यता निवारण व अहिंसा की शपथ लेते हैं। लोगों का मानना है कि रुंगटा नदी के आसपास बापू के आदर्श का अहसास होता है। लोग यहां नशामुक्ति, छूत-अछूत और हिंसा त्यागने की शपथ लेते हैं।

फोटो सौजन्य: आशीष नामदेव, बुढ़ार

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