
mp high court
जबलपुर। मप्र हाइकोर्ट ने बिना अनुमति आदिवासी की जमीन के नामांतरण के मसले को गंभीरता से लिया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन की सिंगल बेंच ने जबलपुर तहसीलदार से इस संबंध में रिपोर्ट तलब कर ली है। कोर्ट ने पूछा है कि वास्तविक स्थिति क्या है? मूलत: यह किसकी जमीन है और कारोबारी को कैसे बेच दी गई? क्या मूल मालिक द्वारा संपादित सेलडीड के जरिए जमीन का वैधानिक रूप से नामांतरण किया जा सकता था? ९ अप्रैल तक कोर्ट ने रिपोर्ट मांगी है।
यह है मामला
मदनमहल निवासी दीक्षित पटेल व पंचशील नगर ग्वारीघाट रोड निवासी लखविंदर सिंह सरोवा ने जिला अदालत में परिवाद दायर किया है। कहा गया है कि नर्मदा रोड, गोरखपुर निवासी कारोबारी लाल चंद दासानी ने परिवादियों से नंदिनी रौंसरा स्थित पटवारी हल्का 76, खसरा नंबर 67 की 0.66 हेक्टेयर जमीन का सौदा 36,50,000 रुपए में किया। 25 मई 2015 को उसने परिवादियों के पक्ष में विक्रय पत्र का निष्पादन किया। इसके आधार पर जमीन का नामांतरण परिवादियों के नाम कर दिया गया। इसी दौरान परिवादियों को जानकारी हुई कि दरअसल जमीन आदिवासी की थी, जिसका नामांतरण बिना कलेक्टर की अनुमति के नहीं किया जा सकता था। इस पर उन्होंने विजय नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।
कोई कार्रवाई न होने पर परिवादियों ने जिला अदालत में परिवाद पेश किया। 25 नवंबर 2017 को प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत के निर्देश पर लालचंद दासानी के खिलाफ भादंवि की धारा 406, 419, 420, 467, 468, 471 व एससीएसटी एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया गया। इसी मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए दासानी ने जिला अदालत में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई। 2 फरवरी 2018 को यह अर्जी निरस्त कर दी गई। इस पर दासानी ने अग्रिम जमानत के लिए हाइकोर्ट के समक्ष यह आवेदन पेश किया है।
पचास लाख रुपए लौटाने को था तैयार
अर्जी में कहा गया है कि उक्त जमीन उसने सूखा पाटन निवासी धन्नू पिता कालूराम से 14 सितंबर 2007 को रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए खरीदी थी। इसके अलावा परिवादियों के साथ हुए समझौते के तहत वह उन्हें पचास लाख रुपए लौटा कर उक्त विक्रय पत्र निरस्त करने को तैयार था, इसके बावजूद यह परिवाद दायर किया गया।
कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर खासी नाराजगी जाहिर की कि उक्त जमीन सरकारी रिकार्ड में एससीएसटी समुदाय के लिए दर्ज होने के बावजूद कलेक्टर की अनुमति के बिना इसका नामांतरण कैसे हुआ। कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से हाजिर अधिवक्ता शरद शर्मा को आगामी सुनवाई तक तहसीलदार की जांच रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि 14 सितंबर 2007 को आवेदक के पक्ष में मूल भूमि स्वामी धन्नू द्वारा निष्पादित सेलडीड की जांच की भी जांच की जाए। रिपोर्ट में यह उल्लेख किया जाए कि उक्त सेलडीड के जरिए यह जमीन वैधाानिक रूप से आवेदक को नामांतरित की जा सकती थी अथवा नहीं।
Published on:
03 Apr 2018 12:32 pm

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