
शंकर शाह और रघुनाथ शाह की प्रतिमा
संस्कारधानी के इतिहास का गौरव है आदिवासी समाज, 3.75 लाख है जिले में आबादी
जबलपुर।
नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी के समीपवर्ती वन्य इलाकों में शताब्दियों से आदिवासियों का प्राकृतिक आवास रहा है। उसी जमाने से बड़ी संख्या में आदिवासी यहां रहते आ रहे हैं। गोंडवानाकाल में नगर में बसे आदिवासियों ने खासी आर्थिक प्रगति की थी। स्वतंत्र भारत में शहर के इस समुदाय ने शिक्षा की ओर ध्यान देना आरम्भ किया। विभिन्न हुनर सीखकर अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करना आरम्भ कर दिया। शिक्षा व रोजगार के चलते समय के साथ इनके रहन-सहन में खासा बदलाव आया। आदिवासी समुदाय की शहर में जनसंख्या भी बढ़ी। आजादी के पूर्व गोंड शासक संग्रामशाह व रानी दुर्गावती यहां के आदिवासी समुदाय का गौरव थे , तो स्वतंत्रता संग्राम में गोंड राजा शंकरशाह व रघुनाथ शाह का बलिदान नहीं भुलाया जा सकता। आज शहर का आदिवासी समाज न केवल संगठित है, बल्कि शिक्षा, रोजगार की रोशनी में आधुनिकता के साथ कदमंताल भी कर रहा है।
मंदिर हैं गोंडवाना की समृद्धि के प्रतीक-
विदेशी आक्रांताओं से दक्षिण भारत की कला और संस्कृति संभवत: इसलिए सुरक्षित रही, क्योंकि देश के मध्य में गोंडवाना चट्टान की भांति अडिग रहा। गोंडकाल में धर्म, कला, संस्कृति, संगीत और साहित्य को अच्छा बढ़ावा मिला। गोंडकाल के निर्माण, वास्तुकला आज भी गोंड राजाओं की विकसित सोच को दर्शाती है। गोंड राजवंश में शासन भले ही किसी राजा का रहा, लेकिन सभी ने हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा की संदेश दिया। गोंड राज्य की सीमाओं की दूर-दूर तक बढ़ाने का श्रेय महाराजा संग्रामशाह को जाता है। उनके शासनकाल में न केवल राज्य ने विशालता पाई, बल्कि हर क्षेत्र में सत्ता को सुदृढ़ता मिली। अनेक निर्माण कार्य हुए, जिसमें उन्न्त वास्तुकला के नमूने आज भी गोंडवाना की समृद्धि के प्रतीक हैं। संग्राम सागर का बाजनामठ, पचमठा गढ़ा के मंदिर समूह, बूढ़ी खेरमाई मंदिर, मदनमहल का शारदा मन्दिर के अलावा गोंडवानाकाल के कई मंदिर गोंड राजाओं की धर्मपरायणता के पर्याय हैं।
उच्च शिक्षा में आगे-
आदिवासी समाज आज मुख्यधारा में शामिल होकर कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहा है। आदिवासी समाज के बच्चे अब स्कूल ही नहीं बल्कि उच्च शिक्षा के लिए भी उंची उड़ान भर रहे हैं। तकनीकी और मेडिकल की पढ़ाई के लिए भी इस समाज के बच्चे अब आगे आ रहे हैं। शिक्षा के साथ समाज के रहन शहन और जीवन शैली में भी परिवर्तन आया है जो बताता है कि अब यह समाज उपेक्षित नहीं बल्कि खुद आगे बढ़ रहा है। जबलपुर जिले में ही करीब 3.75 लाख की आबादी आदिवासी समाज की है। जिले में कुंडम, चरगवां, शहपुरा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में शामिल है इसके अलावा बरेला, पाटन , मझौली क्षेत्र में भी इनकी कुछ आबादी है।
40 फीसदी की जीवनशैली बदली-
शिक्षा ने इस समुदाय के 40 फीसदी लोगों की जीवनशैली को बदल दिया है। गढ़ा गोंडवाना संरक्षण संघ के केएल भलावी ने बताया कि पंचायती राज में पंच, सरपंच, जनपद अध्यक्ष, जनपद प्रतिनिधि, जिला पंचायत प्रतिनिधि जैसे पदों को इस समाज के लोगों ने सुशोभित किया है। आज युवा वर्ग हो या फिर खेती किसानी, नौकरी पेशा करने वाला अब वह भी तकनीकी रूप से अपडेट हुआ है। कम्प्यूटर, मोबाइल, लेपटॉप के उपयोग में दूसरे से पीछे नहीं हैं। खेती किसानी में भी मोबाइल तकनीक का उपयोग कर रहा है । जो इस समाज के जीवन शैली में हुए बदलाव को बताता है।
अमर हो गए शंकरशाह-रघुनाथशाह--
इतिहासकार डॉ आनन्द सिंह राणा बताते हैं कि 1857 में जबलपुर में तैनात अंग्रेजों की 52वीं रेजीमेंट का कमांडर क्लार्क बहुत ही क्रूर था। वह इलाके के छोटे राजाओं, जमीदारों को परेशान किया करता था और मनमाना कर वसूलता था। इस पर तत्कालीन गोंडवाना राज्य के राजा शंकर शाह और उनके बेटे कुंवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेज कमांडर क्लार्क के सामने झुकने से इंकार कर दिया। दोनों ने आसपास के राजाओं को अंग्रेजों के खिलाफ इकट्ठा करना शुरू किया। बताया जाता है कि दोनों बाप बेटे अच्छे कवि थे और वह अपनी कविताओं के जरिए राज्य में लोगों को क्रांति के लिए प्रेरित करते थे। पिता पुत्र से डरे अंग्रेजों ने उनकी आवाज दबाने के लिए शंकर शाह और रघुनाथ शाह को मारने का षड्यंत्र रचा और इनके पाले हुए एक स्थानीय राजा ने अंग्रेजों को शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बारे में जानकारी दे दी। अंग्रेजों ने चालाकी से इन गोंड राजाओं को गिरफ्तार कर लिया। भरे बाजार में जबलपुर कमिश्नरी के सामने 18 सितंबर 1857 को पिता और पुत्र को तोप के आगे बांधकर उड़ा दिया। शंकर शाह और रघुनाथ शाह की याद में रेलवे स्टेशन मालगोदाम चौक पर दोनों की प्रतिमा की स्थापना की गई है।
Published on:
13 Jun 2023 12:02 pm
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