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भले ही यह गुमनाम छोटा सा गांव है, फिर भी यहां 200 देशों के लोग ज्ञानार्जन के लिए पहुंचते हैं

भावातीत ध्यान के प्रणेता महर्षि महेश योगी का का खास नाता है जबलपुर के पड़ोसी करौंदी का    

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Maharishi Mahesh Yogi

Maharishi Mahesh Yogi

जबलपुर। अगर सब कुछ महर्षि महेश योगी के हिसाब से हुआ होता, तो आज जबलपुर शहर विश्व की सबसे ऊंची इमारत के सबसे करीबी शहर होता। लेकिन, विमान और रक्षा मंत्रालय की अनुमति न मिल पाने के कारण यह सपना अधूरा रह गया। आज महर्षि योगी का जन्मदिवस है। महर्षि महेश योगी चाहते थे कि समीपी ग्राम करौंदी में विश्व की सबसे बड़ी इमारत बनाई जाए। इसका डायग्राम भी तैयार कर लिया था। उन्होंने 2222 फीट ऊंचाई की इमारत बनाने की योजना बनाई थी। 2002 में अधारशिला भी रखी गई, लेकिन यह सपना सपना ही रह गया। कटनी जिले के छोटे से गांव बम्हनी का आश्रित गांव करौंदी देश का इकलौता ऐसा स्थान है, जहां 200 से अधिक देशों के लोग महर्षि महेश योगी की ओर से स्थापित गुरुकुल में ज्ञानार्जन के लिए पहुंचते हैं। भावातीत ध्यान के प्रणेता महर्षि महेश योगी के आश्रम में सालभर न सिर्फ विदेशी सैलानियों बल्कि वेद विद्या प्राप्त करने वाले वटुकों का तांता लगा रहता है। मनीषियों का मानना है कि यह देश का सेंटर प्वाइंट है, जो मन को भी केंद्रित करता है। इसके चलते आसानी से ज्ञानार्जन होता है।
वेदों का मिल रहा ज्ञान
इस आश्रम में छात्रों को वैदिक ज्ञान दिया जा रहा है। वेद विज्ञान विद्या पीठ संचालित हो रहा है। यहां पर वेद, विज्ञान की जानकारी कुशल ज्ञाताओं द्वारा वटुक ब्राम्हणों को दी जाती है। केंद्र बिंदु के सामने महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय स्थित है। यहीं पर महर्षि विद्या मंदिर बना है। कक्षा एक से 10 तक सीबीएसई की शिक्षा दी जा रही है। महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास ही स्थित पांडुका गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम रामप्रसाद श्रीवास्तव था। महर्षि योगी का वास्तवित नाम महेश प्रसाद श्रीवास्तव था। उनके पिता राजस्व विभाग में कार्यरत थे। नौकरी के सिलसिले में उनका तबादला जबलपुर हो गया। लिहाजा पूरा परिवार जबलपुर के गोसलपुर में रहने लगा। योगी का बचपन यहीं बीता। उन्हें यहां की प्रकृति बहुत पसंद थी। यहां के हितकारिणी स्कूल से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी की उपाधि ली और साथ ही गन कैरिज फैक्ट्री में उच्च श्रेणी लिपिक के पद पर उनकी नियुक्तिहो गई। एक दिन वे साइकिल से बड़े भाई के घर की तरफ जा रहे थे। तभी उनके कानों में सुमधुर प्रवचन सुनाई पड़े। वे साइकिल को एक तरफ पटक कर वहां खिंचे चले गए। जैसे ही उन्होंने स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को देखा और सुना तो अपनी सुध-बुध खो बैठे। उसी क्षण उनके मन में वैराग्य जागृत हो गया। उसके बाद योगी फिर कभी घर नहीं गए। उनके लिए पूरा विश्व परिवार की तरह हो गया।