
जनरल नियाजी के साथ पाकिस्तार टॉप के कमांडर भी जबलपुर लाए गए थे।
जबलपुर. 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर फतह जबलपुर के लिए भी यादगार है। क्योंकि, पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी को कॉलेज ऑफ मटेरियल मैनेजमेंट (सीएमएम) की बैरक में युद्धबंदी के रूप में रखा गया था। उन्हें लम्बे समय तक यहां के साधारण से भवन में रखा गया। रिहाई तब हुई, जब शिमला समझौता के तहत पाकिस्तान के सभी युद्धबंदी सैनिक भारत से वापस भेज दिए गए। जनरल नियाजी के साथ पाकिस्तार टॉप के कमांडर भी जबलपुर लाए गए थे।
सैन्य दृष्टि से जबलपुर शुरू से महत्वपूर्ण स्थानों में शामिल रहा है। अंग्रेजों की यह पसंदीदा जगह रही है। इसलिए उन्होंने यहां न केवल छावनी बनाई बल्कि उनके समय दो आयुध निर्माणियों की स्थापना की गई। जब भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी तो इस शहर का योगदान और बढ़ गया था। यहां पर सेना के ट्रेनिंग सेंटर में प्रशिक्षण प्राप्त जवानों ने रणभूमि में अपना पराक्रम दिखाया था। इनमें कुछ सैन्य अधिकारी और जवान शहीद भी हुए।
गुप्त और सुरक्षित जगह की तलाश
जब पाकिस्तानी सेना ने आत्म समर्पण किया तो सैनिकों को यहां-वहां रखा गया लेकिन उनके सेना कमांडर के लिए गुप्त और सुरक्षित जगह की तलाश की गई। इस लिहाज से जबलपुर उचित था। उन्हें कॉलेज ऑफ मटेरियल मैनेजमेंट (सीएमएम) के युद्धबंदी शिविर में रखा गया। इतिहासकार डॉ आनंद सिंह राणा का कहना है कि सीएमएम में युद्ध बंदी शिविर 100 बनाया गया था। इस शिविर की पूरी व्यवस्था जनवरी 1972 में हुई थी। इसमें पाकिस्तानी सेना के उन विशिष्ट सैन्य अधिकारियों को रखा गया था जिन्हें भारतीय सेना की पूर्वी कमान ने बंदी बनाया था। उनके लिए यहां पर बैरक तैयार की गई थी।
यह टॉप कमांडर थे जबलपुर में
पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी के अलावा मेजर जनरल मुहम्मद हुसैन अंसारी, मेजर जनरल नजर हुसैन शाह, मेजर जनरल राव फरमान अली, मेजर जनरल मुहम्मद जमशेद, मेजर जनरल काजी अब्दुल मजीद खान, रियर एडमिरल मुहम्मद शरीफ और एयर कमांडर इनामुलहक खान को युद्धबंदी के रूप में सीएमएम में रखा गया। यह बैरक आज भी बनी हुई है। हालांकि उसका स्वरूप को बदला जा चुका है। उसका उपयोग भी किया जाता है। उस समय युद्धबंदियों का यह स्थान कटीले तारों से घिरा था। इन पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को बिल्कुल भी पता नहीं था कि उन्हें भारत में कहां रखा गया। हां युद्धबंदियों को जिनेवा समझौता के तहत सुविधाएं मिलती रहीं हैं।
इन्होंने दी थी युद्ध में कुर्बानी
इस युद्ध में सैकड़ों सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे। जबलपुर के कुछ वीर योद्धा थे जिन्होंने देश की शान की खातिर अपने प्राणों की आहूति दे दी। इतिहासकारों के अनुसार शहीद डेविड एलेक्जेंडर देवदासन सेकेण्ड लेफ्टिनेंट (आर्मी) के पद पर कार्यरत थे। वे आपरेशन कैक्टस-लिली एवं सर्चलाइट के दौरान शकरगढ़ सेक्टर में 10 दिसंबर 1971 शहीद हुए। उन्हें वीर चक्र मिला था। पायलट ऑफिसर्स श्रीकृष्ण गजानन खोण्डे भी 4 दिसंबर को हाशीपारा (असम) में आपरेशन कैक्टस-लिली के दौरान शहीद हुए। फ्लाइट लेफ्टिनेंट (एयर फोर्स) मनोहर पुरोहित 9 दिसंबर को बीकानेर (जामसर) में आपरेशन कैक्टस-लिली में शहीद हुए। थलसेना में कैप्टन अमिताभ गुहाराय जैसोर सेक्टर में आपरेशन जैकपाट के दौरान शहीद हुए थे। इसी प्रकार सेकेंड लेफ्टिनेंट ऑलिवर विल्सन ने छम्ब क्षेत्र में पश्चिमी मोर्चा पर देश की रक्षा में अपने प्राण गवाएं थे।
सैनिकों ने टेके थे घुटने
भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया। पाकिस्तानी सेना ने भारतीय जांबाजों के आगे घुटने टेक दिए थे। तीन दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 तक दोनों सेनाएं अलग-अलग स्थानों पर आमने-सामने थीं। जल, थल और आकाश में भी तिरंगा की शान के लिए सैनिकों ने दुश्मन पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। 16 दिसंबर को पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया था। उसके 93 हजार से अधिक सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया गया। इस युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान का नामोनिशान मिट गया। फिर बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसलिए हर वर्ष सेना 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाती है।
आयुध निर्माणियों का अपना योगदान
सेना के साथ आयुध निर्माणियों का बड़ा योगदान रहा। जब युद्ध शुरू हुआ तो कर्मचारियों में देशभक्ति की भावना देखते बनती थी। उनमें उत्पादन को लेकर गजब का उत्साह था। दिन रात मशीनें चलती थीं। फिर रेलमार्ग और सड़क मार्ग से रसद यहां से भेजी जाती रही। वीकल फैक्ट्री में बने शक्तिमान वाहनों की मदद से सेना की रसद और सैनिक युद्धक्षेत्र में भेजे गए। कुछ अन्य वाहन थे, जिनका इस्तेमाल किया गया गया था। आयुध निर्माणी खमरिया में कई प्रकार के बमों का निर्माण भी उस समय तेजी के साथ हुआ था। यहां से तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग प्रकार के बमों को सप्ताई किया गया। वहीं गन कैरिज फैक्ट्री में तैयार की गई तोप भी सेना ने इस्तेमाल की। इनके सहारे ही पाकिस्तानी सेना को देश के सैनिकों ने पीछे खदेड़ा था।
Published on:
16 Dec 2022 12:18 pm
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