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मनीष गर्ग@जबलपुर। पराली जलाने से कम हो रही भूमि की उर्वराशक्ति से निपटने के लिए खरपतवार अनुसंधान निदेशालय संरक्षित खेती के माध्यम से किसानों को बोवनी की नई तकनीक का प्रशिक्षण दे रहा है। किसानों को परम्परागत उपकरणों के स्थान पर नए हैप्पी सीड ड्रिल यंत्र का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इससे खेत में पराली जलाए बिना किसान सीधे बोवनी कर पराली को खाद में तब्दील कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस नई तकनीक से भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है। लागत कम आती है। उत्पादन भी वृद्धि होती है। जिले में अभी लगभग 10 हजार एकड़ में किसान बिना जुताई किए बोवनी कर पराली को खाद में तब्दील कर भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ा रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार हार्वेस्टर से धान, गेहूं सहित दलहनी फसलों की कटाई के बाद खेत में लगभग एक फीट तक उनके अवशेष रह जाते हैं। इसे सामान्य भाषा में पराली कहा जाता है। किसान दूसरी फसल बोने से पहले पराली जलाते हैं। फिर कल्टीवेटर से दो-तीन बार गहरी जुताई कर सीड ड्रिल से बोवनी करते हैं। इस प्रक्रिया में खर्च के साथ समय भी ज्यादा लगता है।
यह है नई तकनीक- कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नई तकनीक से किसान को जुताई की जरूरत नहीं होती। बोवनी के लिए एक ही यंत्र हैप्पी सीड ड्रिल रखना होता है। किसान हार्वेस्टर से धान की फसल काटन के बाद दूसरे दिन गेहूं की बोवनी कर सकते हैं। इसी तरह गेहूं की कटाई के बाद दूसरे दिन ही मूंग की बोवनी की जा सकती है।
इस तरह हटाता है पराली- हैप्पी सीड ड्रिल में फलोल लगे होते हैं, जो रोटरी का कार्य करता है। खाद-बीज गिरने से पहले जो फसल अवशेष इसके सामने आते हैं, उन्हें फलोल काट कर हटा देता है। मशीन में लगे दांती से एक चीरा लगाया जाता है, इससे खाद और बीज खेत में उचित गहराई पर गिरते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार नई तकनीक से खेती में खर्च लगभग 4500 रुपए प्रति हेक्टेयर की बचत की जा सकती है। फसल अवशेष जो मृदा के ऊपर रहते हैं, वे खरपतवार के प्रभाव को 20-25 प्रतिशत तक करके निदाई में होने वाले खर्च को कम करते हैं। पलारी के रूप में बचे फसल अवशेष मृदा से वाष्पीकरण को रोकते हैं। इससे नमी संचित रहती है और फसल को पानी की आवश्यकता भी कम होती है। फसल अवशेष मृदा में रहकर सड़ जाते हैं, जिससे मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या तथा कार्बनिक पदार्थों में वृद्धि होती है। मृदा स्वास्थ्य में भी वृद्धि होती है।
खतरनाक प्रदूषण का स्तर होता है कम
अध्ययन के अनुसार प्रति हेक्टेयर धान से लगभग सात टन फसल अवषेष उत्पादित होता है। इसे जलाने से पांच टन प्रति हेक्टेयर कार्बन डाई ऑक्साइड, 40.6 किलो मीथेन और 2.03 किलो नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसी प्रकार गेहूं से लगभग 5 टन प्रति हेक्टेयर फसल अवशेष निकलते हैं। इन्हें जलाने पर 2.25 टन प्रति हेक्टेयर कार्बन डाइ ऑक्साइड, 4.42 किलो मीथेन और 0.92 किलो नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जित होता है। इन उत्सर्जनों को कार्बन डाइ ऑक्साइड के समतुल्य के आधार पर देखें तो कुल ग्रीन हाउस गैस 216 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से उत्सर्जित होती है। अन्य प्रदूषक भी हवा में उत्सर्जित होते हैं, उनकी मात्रा लगभग 605.6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें प्रमुखता से पार्टीकुलेट मेटर पीएम 2.5 एवं 10, सल्फर डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड एवं अन्य शामिल है। पराली नहीं जलाकर इन हानिकारक तत्वों से वातावरण को जहरीला होने से बचाया जा सकता है।
लागत कम, पर्यावरण को भी फायदा
जिले के किसान नई तकनीक अपना रहे हैं। संरक्षित खेती की यह एक सरलीकरण प्रक्रिया है। इसमें पराली जलाए बिना और बिना जुताई बोवनी करके भूमि की उर्वराशक्ति व उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। किसान अत्याधुनिक यंत्र हैप्पी सीड ड्रिल से खेती करके उत्पादन बढ़ा रहे हैं। नए यंत्र से फसल अवशेष पलारी खेत में ही रहकर प्राकृतिक खाद में परिवर्तित हो जाती है। इस तरह से खेती करने से दूरगामी परिणाम बेहतर होंगे। भूमि की उर्वराशक्ति बढऩे के साथ रसायनों पर निर्भरता कम होगी। लाभकारी एवं पर्यावरण हितैषी समय की मांग है। पराली जलाने से होने वाले नुकसान को रोकने के लिए खरपतवार अनुसंधान निदेशालय की यह पहल है।
- डॉ. जेएस मिश्रा, निदेशक, खरपतवार अनुसंधान निदेशालय
Published on:
12 Feb 2022 10:27 am
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