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हंसी चेहरे पे आ जाये, कहीं वो पल नहीं मिलता, अपाहिज हुई हैं आशाएं, कोई सम्बल नहीं मिलता

पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, विद्यासागर सेवाश्रम सेवा समिति (गौशाला) सम्मेदगिरी का आयोजन

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जबलपुर/सिहोरा। बन जा रे मन तू महावीर नाम का दीवाना, पहले तू कर्तव्य निभा फिर धर्म की राह पकड़ ले, रिश्ते नातों की दुनिया में पग-पग तू बढ़ाना। बन जा रे मन तो महावीर नाम का दीवाना...। कवियत्री अर्चना अर्चन जबलपुर की कविता से पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर झंडा बाजार गूँज उठा। अवसर था भगवान महावीर स्वामी की जयंती पर विद्यासागर सेवाश्रम सेवा समिति (गौशाला) सम्मेदगिरी गोसलपुर और अखंड जैन समाज द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन का। कवि सम्मेलन में कवियों ने एक से बढ़कर एक हास्य-व्यंग, वीर और श्रंगार रस की कविताओं से मंत्रमुग्ध कर दिया।

दीप प्रज्ज्वलन, पूजन से शुभारम्भ
कवि सम्मेलन का शुभारम्भ मां सरस्वती और आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के तैलचित्र पर दीप प्रज्ज्वलन, पूजन से हुआ। डॉ.आनंद मोहन जैन, अरविंद सिंघई, अरूण जैन, राकेश जैन, विनय जैन, जयश्री जैन, मुक्ता सिंघई, संगीता सिंघई, माया जैन, नीता जैन, निशा जैन, नीतू सिंघई, मैत्री जैन, ऋषभ जैन ने कवियों का स्वागत किया।

दीपक शुक्ला"दनादन" ने हंसी चेहरे पे आ जाये, कहीं वो पल नही मिलता अपाहिज हुई हैं आशाएं, कोई सम्बल नही मिलता। सुगंधित धूप ने तो दी कड़कती ठंड से राहत, जले तो छाँव देने को कोई बादल नही मिलता।

दीपक शुक्ल भोपाल ने सारे आकाश में रंगीं सितारे भर दूंगी तुम्हारे सब दुखों को दरकिनार कर दूंगी। मुझे दुनिया मे आने दो न कोख में मारो तुम्हारी नाव को मैं गंगा पार कर दूंगी।

आशीष सोनी गाडरवाड़ा ने सियासी लोग वफादार नहीं हो सकते । कभी यकीन के हकदार नही हो सकते। चन्द सिक्कों में जो अपनी जुबान बन्द रखे । इतने गद्दार कलमकार नहीं हो सकते।

संतोष शर्मा "सागर" (विदिशा) हास्य व्यंग्य कवि शायर मंच संचालक ने गीत गजलों में जब गुनगुनाते है हम, अपने दिल की कहानी सुनाते है हम,हमारी कविता को दिल से सुनो तो सही,इश्क़ की ताल पर स्वर सजाते है हम।

"नीरज पांडेय" सिहोरा ने मैं अपने गीत गजलों से तुम्हे मजबूर कर दूंगी, तुम्हारे पास जो गम है उन्हें मैं दूर कर दूंगी, तेरे होंठो पे एक मुस्कान लाने के लिए अर्चन,मैं खुद बदनाम हो लुंगी, तुम्हे मशहूर कर दूंगी।

अश्वनी पाठक सिहोरा ने आदमी ही आदमी के खून का प्यासा, नही विश्वास कब,विध्वंश का पलटे कहा पाँसा, बनाये प्रेम का अणुबम,न जिसकी धार हो कुंठित, बदल दे युद्ध की,संघर्ष की,आतंक की भाषा।

प्रख्यात मिश्रा"लखनऊ ने "देश को जवाहर से लाल तो मिले परन्तु, मान स्वाभिमान तेरा लल्ला न दिला सके, जिनके लिए तू शत्रु की गोलियों को खाता रहा,लोग तेरी अम्मा को न रोटियां खिला सके"। रचनाओं से उपस्थित लोगों को भाव-विभोर कर दिया।