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महाभारत के इस महायोद्धा ने इसलिए रोक ली थी मौत

भीष्म ने सूर्य उत्तरायण होने पर ही त्यागी थी देह, मकर संक्रांति से सूर्य होता है उत्तरायण

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neeraj mishra

Jan 09, 2017

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जबलपुर। महाभारतकाल में भीष्म पितामह को महायोद्धा के रूप में याद किया जाता है। युद्ध में जब अर्जुन ने भीष्म पितामह को अपने बाणों से बुरी तरह घायल कर दिया तब भी उनकी मौत नहीं हुई। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने अपनी देह तभी त्यागी जब सूर्य उत्तरायण हो गए। सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इसका इतना महत्व क्यों हैं, भीष्म क्यों शर शैया पर भीषण दर्द सहते हुए भी सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे, इस संबंध में पौराणिक ग्रंथों में विस्तृत विवरण दिया गया है। गीता में भी सूर्य उत्तरायण की अहमियत बताई गई है।


देवताओं के दिन का होता है शुभारंभ

मकर संक्राति के दिन से सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इस परिवर्तन के साथ ही सूर्य दक्षिणी गोलाद्र्ध से उत्तरी गोलाद्र्ध की ओर बढऩा शुरु होता है अर्थात सूर्य उत्तरायण होता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश के साथ उत्तरायण होना बेहद शुभ माना जाता है। उत्तरायण को देवताओं के दिन का शुभारंभ भी कहा गया है।

मिल जाता है मोक्ष

शास्त्रों में कहा गया है कि सूर्य उत्तरायण होते हैं तो पृथ्वी प्रकाशमय हो जाती है। सूर्य के इस प्रकाश को ही विशेष प्रभावकारी बताया गया है। इस प्रकाश में किसी की मौत होती है तो वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। पुनर्जन्म के इस चक्र से मुक्त होने और ब्रह्मावस्था प्राप्त करने के लिए ही पितामह भीष्म नुकीली बाणों पर लेटे हुए भी सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे थे। भगवान कृष्ण ने गीता में यह बात कही है। उन्होंने कहा है कि सूर्यदेव के उत्तरायण होने के बाद प्रकाशित पृथ्वी पर देह त्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता। इसके विपरीत स्थिति सूर्य के दक्षिणायन रहने पर होती है। दक्षिणायन सूर्य के कारण पृथ्वी अंधकारमय रहती है और इस अंधेरे में मृत व्यक्ति को पुनर्जन्म लेना होता है।

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