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makar sankranti special … और अचानक सात हिस्सों में बंट गई नदी, हैरान कर देता है रहस्य

सप्त त्रषियों की तपोस्थली है सतधारा, लकड़ी से निर्मित सामग्री के लिए देश भर में ख्यात है यहां का मेला

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जबलपुर। भगवान सूर्य के अयन परिवर्तन का वक्त करीब आ रहा है। १४ जनवरी को वे मकर राशि में प्रवेश करने के साथ उत्तरायण हो जाएंगे। सूर्य के उत्तरायण होने की खुशी में मेलों के आयोजन का दौर सदियों से चला आ रहा है। मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान के साथ लड्डुओं के जायके का दौर चलेगा। देश की मिट्टी से जुड़ी परम्परा की सोंधी खुशबू फिर महंक उठेगी। संक्रांति पर जबलपुर में कई मेले भरते हैं। आइए आज बात करते हैं सिहोरा के समीप हिरन नदी के किनारे आयोजित होने वाले सतधारा के एतिहासिक मेले की..। इस दस दिवसीय मेले शुभारंभ १४ जनवरी को होगा। इसकी तैयारियां जोरों पर हैं। यहां हिरन नदी सात धाराओं में बटी नजर आती है। नदी की इन धाराओं के सात भागों में विभक्त होने के पीछे भी एक रहस्य समाया हुआ है।

सप्त ऋषियों की तपोस्थली
जबलपुर जिले के सिहोरा तहसील मुख्यालय से करीब २० किलोमीटर दूर मझगवां रोड पर स्थित सतधारा के मेले में आज भी हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। संतों-महंतों का पड़ाव रहता है। कुशयारी ग्राम निवासी राजेन्द्र दुबे व गौरीशंकर दुबे के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यहां कूम्ही के समीप हिरन नदी के किनारे सप्त ऋषियों ने तपस्या की थी। यह स्थान एक तरह का सिद्ध क्षेत्र माना जाता है। कई नागा साधु धूनी रमाए, अपना पड़ाव डाले रहते हैं।

दूध की तरह दिखती हैं धाराएं
सतधारा निवासी रमेश पटेल व सरौली निवासी नरेश पाठक के अनुसार उक्त स्थान के नामकरण से भी एक किंवदंति जुड़ी हुई है। बुजुर्गों से यह बात सुनी है कि सदियों पूर्व यहां हिरन नदी के किनारे सप्त ऋषि तपस्या कर रहे थे। इसी दौरान हिरन नदी का जल स्तर बढ़ गया। नदी का पानी पूरे वेग से सप्त ऋषियों के पास तक आया और नदी ने एक कन्या का रूप रखकर ऋषि वर से आगे जाने के लिए रास्ता मांगा। जब बार बार आग्रह के बाद ध्यान में मग्न ऋषि की तपस्या नहीं टूटी तो हिरन ने अपने वेग को बढ़ाया। इस वेग से अचानक यहां सात धाराएं फूट पड़ीं। इन्ही सात धाराओं के माध्यम से ऋषियों को बचाते हुए हिरन नदी आगे की तरफ बढ़ गई। इन्हीं सात धाराओं की वजह से इसका नाम सतधारा प्रचलित हो गया। इसके पास ही कूम्ही ग्राम बसा है। विशेषकर मकर संक्रांति के दिन आज भी ये धाराएं दूध की तरह चमकती नजर आती हैं। हजारों लोग यहां दर्शन और स्नान का पुण्य अर्जित करने के लिए पहुंचते हैं।

तैयारियों का दौर
कूम्ही निवासी रामबरन पटेल ने बताया कि सतधारा मेले के लिए तैयारियां शुरू हो गई हैं। यह मेला करीब 30 एकड़ के क्षेत्र में लगता है। जिसमें मनिहारी सामान, लकड़ी, पत्थर, खाने-पीने की वस्तुएं की दुकानें लगाई जाती हैं। एक समय मेले में लकड़ी और लोहे से बनी कलात्मक वस्तुओं के लिए इसकी ख्याति पूरे देश में थी। खासकर लकड़ी की सामग्री पलंग, कुर्सियां, टेबिल, झूले आदि खरीदने के लिए पूरे देश से थोक व्यापारी भी यहां आते थे।

प्राचीन शिवमंदिर
सतधारा के समीप एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। जानकार बताते हैं कि रानी दुर्गावती के समय में गंगागिरी गोसाईं यहां तट पर भगवान शंकर के शिवलिंग का बनाकर पूजा करते थे। एक दिन मिट्टी से बना शिवलिंग अचानक पत्थर का बन गया। जिसकी स्थापना शिव मंदिर में की गई। यह मंदिर २५० वर्षों से भी अधिक पुराना है। बताया गया है कि गासाईं अंग्रेजों से मुकाबला करते वक्त वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी समाधि मंदिर के बाजू में स्थापित है। इस बात का उल्लेख तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर हीरालाल ने जबलपुर जिले के इतिहास में किया है, तभी से यहां मेले की शुरुआत हो गई।

अष्टधातु की अनूठी प्रतिमा
कूम्ही निवासी राकेश तिवारी के अनुसार करीब 60 वर्ष पहले मैहर से श्री नीलकंठ स्वामी (रामपुर) से कूम्ही आए थे। उन्होंने यहां आश्रम में अष्टधातु से निर्मित भगवान श्री कृष्ण , श्रीगणेश की प्रतिमा की स्थापना कराई। मंदिर में द्वारिकाधीश भगवान की प्रतिमा स्थापना की उनकी इच्छा थी, लेकिन इसके पूर्व उन्होंने समाधि ले ली। नीलकंठ स्वामी की प्रतिमा आज भी आश्रम में है।

ब्रिटिश काल में भी रहा जलवा
जानकारों का कहना है कि सतधारा मेले का इतिहास तीन सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। कुछ समय तक पंचायत मेले का आयोजन कराती रही। 1932 में ब्रिटिश शासन लोकल बोर्ड द्वारा इसका आयोजन कराया जाने लगा। बाद में जनपद पंचायत प्रशासन के इसकी मुख्य आयोजक संस्था बन गई। जो हर वर्ष मेले का आयोजन कराती है।