
mosquitoes
जबलपुर. शहर में मलेरिया के मामले नहीं मिल रहे हैं। सरकारी स्तर पर जांच से लेकर निजी लैब में होने वाली ब्लड जांच में मलेरिया के मरीज सामने नहीं आ रहे हैं। पड़ोसी जिला मंडला के जंगल से लगे ट्राइबल इलाके में 16 प्रतिशत मरीज मलेरिया होने पर गुनिया और झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं। या फिर इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं। इनमें से ज्यादातर लोग कम पढ़े-लिखे हैं। ये बात डॉ. कुणाल पीपरे के रिसर्च में सामने आई। हालांकि ये स्थिति केवल दूरस्थ वन क्षेत्रों में ही सामने आई।
दो सौ लोगों पर रिसर्च
डॉ. कुणाल ने दो सौ लोगों पर रिसर्च किया। इसमें उन्होंने मंडला के आठ ब्लॉक के लोगों को शामिल किया। हर ब्लॉक से 24 लोगों को रिसर्च में लिया गया था। इनमें बीजाडांडी, निवास, नैनपुर, नारायणपुर समेत अन्य ब्लॉक शामिल हैं। रिसर्च में 18 से 80 साल तक की उम्र वालों को शामिल किया गया। खास बात ये है कि बड़ी संख्या में लोगों को ये भी जानकारी नहीं थी कि मलेरिया की बीमारी मच्छर काटने से होती है। पचास प्रतिशत लोगों ने मच्छर काटने से बचाव के लिए मच्छरदानी लगाने, नीम की पत्ती, कंडे जलाने व सरकारी अस्पताल में जाने की बात कही।
जागरुकता से बदली तस्वीर
नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विशेषज्ञों के अनुसार मलेरिया जागरुकता कार्यक्रमों से पिछले सालों में तस्वीर बदली है। लोग मच्छर से बचाव के लिए घरों में दवा छिड़काव, अगरबत्ती जलाने से लेकर इलेक्ट्रिक रैकेट का इस्तेमाल करते हैं। मच्छरदानी लगाते हैं। कई प्रकार के तेल व ट्यूब का भी उपयोग करते हैं।
मलेरिया से मुक्ति दिलाने के लक्ष्य पर फोकस
आईसीएमआर के वैज्ञानिक मलेरिया से लोगों को पूरी तरह से मुक्ति दिलाने के लक्ष्य को लेकर काम कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार वैज्ञानिकों ने मलेरिया से मुक्ति के लिए वर्ष 2030 तक का लक्ष्य रखा है।
●दो सौ लोगों पर रिसर्च किया
●रिसर्च में 18 से 80 साल तक की उम्र वालों को किया शामिल
●मलेरिया से मुक्ति के लिए वर्ष 2030 तक का लक्ष्य
●मंडला के आठ ब्लॉक के लोगों को किया शामिल
●हर ब्लॉक से 24 लोगों को रिसर्च में लिया गया
● कई लोगों को पता ही नहीं था मलेरिया मच्छर के काटने से होता है
Published on:
25 Apr 2023 02:00 pm
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