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जबलपुर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रेल प्रशासन को नेक सलाह दी है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गर्भवती महिलाओं, सीनियर सिटिजन व गंभीर रोगियों के हित में यह सलाह दी है। उम्मीद जताई है कि रेलवे कोर्ट की सलाह पर अमल करेगा।
प्रशासनिक न्यायाधीश संजय यादव व जस्टिस अतुल श्रीधरन की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने जनहित याचिका में कोर्ट मित्र (एमीकस क्यूरी) अधिवक्ता समदर्शी तिवारी की ओर से सामने आए कुछ महत्वपूर्ण सुझावों को स्वीकार कर लिया। जबकि शेष सुझावों को रेलवे के लिए खर्चीला मानते हुए जनहित याचिका का मूलभूत दिशा-निर्देशों के साथ पटाक्षेप कर दिया। इस मामले में जबलपुर के अधिवक्ता आदित्य संघी ने भी हस्तक्षेप अर्जी दायर की थी।
हाई कोर्ट ने भारतीय रेलवे से अपेक्षा की है कि गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमारों व सीनियर सिटीजन को रेलवे रिजर्वेशन प्रक्रिया में लोअर बर्थ वरीयता के आधार पर आवंटित की जाये। इसी कड़ी में वीवीआईपी को भी शामिल किया जाय। कैंसर मरीज, वयोवृद्ध व गर्भवती महिलाएं अपर व मिडिल बर्थ में चढ़ने-उतरने में दिक्कत महसूस करती हैं। ऐसे में इन सभी को सीट आवंटन में सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हाइकोर्ट के जस्टिस आरके श्रीवास्तव ने 3 अक्टूबर 2019 को मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा था। उस पत्र में उन्होंने शिकायत की थी कि वे पश्चिम मध्य रेलवे की एक ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। कटनी स्टेशन पर अल्पाहार के लिए उतरे। लेकिन दो मिनट में ही ट्रेन छूट गई। लिहाजा, ट्रेनों के दो मिनट के स्टापेज औचित्यहीन हैं। ट्रेनों की बोगी के दरवाजे भी बहुत छोटे हैं। बोगियों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि यात्रियों को स्टेशन आने या ट्रेन छूटने का पता चल सके। टिकटों के आरक्षण की व्यवस्था भी पारदर्शी नहीं है। कोई भी यात्री कहीं भी बैठता है। पत्र में बोगियों, दरवाजों को बड़ा करने, बोगियों पर भी सिग्नल लगाने एवं टिकट आरक्षण को और पारदर्शी बनाने का आग्रह किया गया था।
Published on:
30 Jul 2020 01:25 pm
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