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18 अगस्त 1945 को अचानक गायब हुए थे सुभाषचंद्र बोस

जबलपुर के तिलवाराघाट त्रिपुरी में  29 जनवरी 1939 को आयोजित कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था।

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Ajay Khare

Aug 18, 2016

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जबलपुर। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता और महान क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस 18 अगस्त 1945 को रहस्मय परिस्थतियों में ताइवान के ताइपेई से अचानक गायब हो गए थे। कहा गया कि एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया। जिसके बाद वे अभी तक सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आए। जबलपुर से नेताजी का गहरा नाता रहा है। यहां 29 जनवरी 1939 को तिलवाराघाट त्रिपुरी में आयोजित कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा समर्थित प्रत्याशी पट्टाभिसीता रमैया को 203 वोटों के अंतर से करारी शिकस्त दी थी।


52 हाथियों का जुलूस निकला था

जानकारी के अनुसार अलग अलग मौकों पर नेताजी तीन बार जबलपुर आए थे। 20 मई 1932 को वे अपने भाई शरतचंद्र बोस के साथ आए थे जिसके एक साल बाद आए और फिर जनवरी 1939 को तिलवाराघाट त्रिपुरी में आयोजित कांग्रेस के 52 वें अधिवेशन में उनका आगमन हुआ। उनकी शानदार जीत के उपलक्ष्य में उस समय 52 हाथियों का जुलूस निकाला गया था। शहर में उनका अभूतपूर्व स्वागत किया गया था।

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आखिर कहां गए नेताजी

नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत को लेकर कहा जाता है कि वे 18 अगस्त 1945 को जिस विमान से जा रहे थे वह ताइवान के ताइहोकू एयर पोर्ट पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसमें उनका निधन हो गया। हालांकि उनकी मौत को लेकर अभी तक विवाद है और यह भी कहा जाता रहा है कि उनकी मौत किसी विमान हादसे में नहीं हुई। देश के आजाद होने के बाद उनके साधु के रूप में जीवन बिताने की बात भी कही गई। अभी तक उनकी मौत के रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है।

23 जनवरी 1897 को हुआ था जन्म

नेताजी का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ था बंग्ला भाषा के अनुसार उनके नाम का उच्चारण शुभाष चॉन्द्रो बोशु होता है। उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लडऩे के लिये, जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन था। उनके द्वारा दिया गया जय हिन्द का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया। क्रांतिकारियों में जोश भर देने वाला उनका एक और नारा "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" स्वतंत्रता संग्राम के दौर का सबसे लोकप्रिय और प्रचलित नारा था। नेता जी ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने 'सुप्रीम कमाण्डरÓ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए "दिल्ली चलो!" का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया था। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई थी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी थी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दिए थे। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया।

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