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पक्षियों को तड़पाकर मारकर अफसरों ने बहादुरी दिखाई, देखने वाले रो पड़े, लेकिन कुल्हाड़ी चलाने वालों का कलेजा नहीं फटा

सैकड़ों पक्षियों की जान लेने के जिम्मेदार अफसर कह रहे हैं कि उन्हें आ रही थी बदबू

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जबलपुर। ऑफिस के बगल वाले पेड़ों पर घोंसले बनाने वाले सैकड़ों पक्षियों को तड़पा-तड़पाकर मार देने के जिम्मेदार अफसरों/कर्मचारियों ने गजब का तर्क दिया है। जबलपुर के बीएसएनएल के कार्यालय के इन जिम्मेदारों का कहना है कि पक्षियों की वजह से ऑफिस में बदबू आ रही थी। वे गंदगी फैला रहे थे। इससे कर्मचारी काम नहीं कर पा रहे थे। लेकिन, पक्षियों के मरने की तस्वीरें देखने वाला हर आम आदमी भावुक हो उठा।
न अइयो इस देश में
लोगों का कहना है कि हर साल अन्य देशों से बड़ी संख्या में पक्षी आते हैं। उक्त परिसर के वृक्षों पर भी कई बाहरी पक्षियों का बसेरा रहता था। गर्मी के बाद ये उड़ जाते थे, लेकिन इस बार ये पक्षी बाहर नहीं गए बल्कि इन्होंने स्थाई ठिकाना बना लिया था। लोगों का कहना है कि घोंसलों से पक्षियों के बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने के बाद भी छंटाई की जा सकती थी। लेकिन, अब तो यही कहा जाएगा कि न अइयो इस देश में।
नहीं मरे भूख-प्यास से
अपने आशियाने में बैठे परिंदों के तमाम बच्चे तड़प-तड़पकर मर गए। वे भूख-प्यास से नहीं मरे। प्राकृतिक आपदा ने भी उन पर कहर नहीं ढाया। उन पर तो इंसानी कहर टूटा है। गलती सिर्फ इतनी थी कि उनके घोंसले सरकारी ऑफिस के परिसर के पेड़ों पर थे। अचानक से फरमान हुआ कि पेड़ों की डालियां काट दी जाएं। क्योंकि, पक्षियों की वजह से यहां गंदगी फैल रही है। इस तरह का फरमान किसने जारी कर दिया? कुल्हाड़ी किसने चलाई? ऐसे सवाल मासूम परिंदे तो करेंगे नहीं। वे कर भी नहीं सकते। लेकिन, इस तरह की 'बहादुरीÓ ने जिस किसी ने भी दिखाई है, वह पत्थर दिल जरूर होगा। कोई भी व्यक्ति सवाल जरूर पूछेगा कि उन्हें तड़प-तड़पकर मरता देख, जिम्मेदारों का कलेजा कैसे नहीं फटा? सही बात तो यह है कि मासूम पक्षियों की तस्वीरें किसी को भी विचलित कर सकती हैं। इन्हें मरता देख यदि किसी की आंखें नम नहीं हुई होंगी, तो शायद सरकारी सिस्टम की? पक्षी आखिर पेड़ पर घोंसला नहीं बनाएंगे, तो कहां बनाएंगे? पक्षियों की मौत से हो सकता है कि किसी को फर्क नहीं पड़े। लेकिन, अपने बच्चे को मरता देखकर उसकी मां की कातर निगाहें यह जरूर कह रही होंगी कि क्या सभ्य समाज ऐसे ही होता है? कुछ लोग कह सकते हैं कि पक्षियों की मौत से कौन सा तूफान आ गया? लेकिन, सच यह भी है कि ऐसा वे लोग ही कहेंगे, जिन्होंने पक्षियों की मासूमियत का अहसास नहीं किया। तस्वीर में नजर आ रहे पक्षी की आंखों में आंखें डालकर किसका जिगरा होगा, जो कह दे कि डालियों पर कुल्हाड़ी चलाना गलत नहीं था? तस्वीर बता रही है कि यह प्रकृति के साथ अत्याचार है।
बेरहमी दिखाई
जबलपुर में पक्षियों के आशियाने को बेरहमी से उजाड़ा गया। वृक्षों पर आरी चलाकर उन्हें भटकने को मजबूर कर दिया। पेड़ों की बेकदरी से छंटाई के दौरान घोंसले और उनमें मौजूद अंडे-बच्चों का भी ध्यान नहीं रखा गया। कई घोंसले धड़ाम से नीचे गिरे, कई डालियों की चपेट में आ आए। पक्षियों के सैकड़ों जन्मे-अजन्मे बच्चे इस लापरवाहीपूर्वक कार्रवाई की भेंट चढ़ गए। सिविल लाइंस स्थित बीएसएनएल महाप्रबंधक कार्यालय परिसर में लगे कई वृक्षों की डालियां रविवार को काट दी गईं। इससे सैकड़ों पक्षियों की मौत हो गई।

मामले में बीएसएनएल की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि पक्षियों की फैलाई जा रही गंदगी से कर्मचारी परेशान हो रहे थे। वहीं इसके लिए उन्होंने उद्यान विभाग से अनुमति ली थी। सवाल उठ रहा है कि जिन परिस्थितियों में पेड़ों की छंटाई की अनुमति दी जाना चाहिए, क्या परिस्थितियां वैसी थीं। क्या प्राप्त अनुमति के दायरे में ही छंटाई की गई है। क्या छंटाई के दौरान मौजूद घोंसलों, अंडों-चूजों की परवाह की आवश्यकता नहीं बनती। घटना की खबर पाकर वन विभाग की टीम ने मौका मुआयना किया। डिप्टी रेंजर कमल सिंह व वनकर्मियों ने पंचनामा बनाया। टीम ने पक्षियों और चूजों के मृत होने के साक्ष्य जुटाए हैं। इसे लेकर प्रकरण दर्ज किया जा सकता है।

पक्षियों द्वारा गंदगी फैलाई जा रही थी, जिससे कर्मचारियों को परेशानी हो रही थी। हमने उद्यान विभाग से अनुमति लेकर डालियों को काटा है। वृक्षों की डाल काटने के पहले ही पक्षी उड़ जाते हैं। हो सकता है, उनके बच्चे और अंडे नष्ट हो गए हों।
-एनके नंदनवार, सहायक महाप्रबंधक प्रशासन बीएसएनएल
जब वन विभाग के कर्मचारी मौके पर पहुंचे तो आरोपी फरार हो गए थे। पेड़ पर पक्षियों का रहवास था, इसलिए परमिशन के बावजूद कटाई करना गलत है। इस मामले में वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत मामला दर्ज किया जाएगा।
- एमएम बरकड़े, रेंजर जबलपुर