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वृद्धाश्रम के लिए बढे़ आवेदन, बनाना पड़ रहा दूसरा भवन

समाज पर सवाल: बुजुर्गेां को नहीं मिल रहा सहारा, कई नि:संतान भी  

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बढ़ते आवेदनों को ध्यान में रखकर प्रशासन अब एक एकड़ जमीन पर 50 सीटर वृद्धाश्रम बनवा रहा है।

जबलपुर@ ज्ञानी रजक. बुढ़ापा बड़ा कठिन होता है। हर बुजुर्ग की यह आरजू रहती है कि उसके जीवन के यह पल शांति के साथ कटे। इसके लिए वे अपनी औलाद से उम्मीद रखते हैं कि जिस जतन से उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया, उसका प्रतिफल वे उन्हे इस उम्र में दें। ऐसा होता है भी है। पर कुछ परिवार ऐसे हैं जहां बुजुर्गों को यह सुख नसीब नहीं होता। इसलिए उनके लिए वृद्धाश्रम एक बड़ा सहारा होता है। शहर के वृद्धाश्रम में कई बुजुर्ग हैं जिन्होंने आवेदन दे रखा है, अब अपनी पारी आने का इंतजार कर रहे हैं।

बाजनामठ तिलवारा रोड में रेडक्रॉस सोसायटी के वृद्धाश्रम में कई बुजुर्ग हैं जो कि निराश्रित हैं। उनका अपना कोई नहीं है। कुछ ऐसे हैं जिनके बेटों ने उन्हें बेसहारा छोड़ दिया है। कुछ बुजुर्गों की बेटियां हैं। लेकिन वे उन पर बोझ नहीं बनना चाहते। इसलिए उन्होंने वृद्धाश्रम का द्वार खटखटाया है। ऐसे बुजुर्गों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। इसलिए यह आश्रम अब कम पड़ने लगा है। इसलिए सोसायटी को एक और बिल्डिंग तैयार करवानी पड़ रही है।

100 लोगों के लिए जगह

वर्तमान में जो आश्रम संचालित है, उसमें महिला और पुरुष मिलाकर 100 लोगों के लिए जगह है। हालांकि जगह के अभाव के कारण लगभग 96 लोग ठीक तरीके से रह पाते हैं। अभी यहां पर 31 पुरुष निवासरत हैं तो महिलाओं की संख्या 57 है। इन्हें रेड क्रॉस सोसायटी नि:शुल्क आवास के साथ ही भोजन उपलब्ध करवाती है। इसकी प्रकार स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं। इनके लिए मनोरंजन के साधन भी हैं ताकि सुबह और शाम को वे इनके जरिए अपने को व्यस्त रख सकें।

कोई औलाद से दुखी तो कोई है अकेला

आश्रम में आने वालों की अपनी-अपनी कहानी है। यह कही न कहीं बदलते परिवेश और हमारी पुरातन सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने वाली साबित होती है। कालू प्रसाद (बदला नाम) के दो बेटे हैं उनकी शादी हो चुकी है तीन बेटियां हैं। वे कभी कभी उनसे मिलने केे लिए आ जाती हैं। प्रेमा बाई (बदला नाम) के तीन बेटा हैँ। कहती हैं बच्चों ने उन्हें कभी मां नहीं समझा। छोटी-मोटी नौकरी कर उन्हें बड़ा किया, लेकिन वे उन्हें भूल गए। अब तो मेरा यही परिवार है। कविता शर्मा (बदला नाम) के बच्चे नहीं है। पति का निधन हो गया। वृद्धावस्था थी तो किसी प्रकार वे यहां पहुंचने में कामयाब हो गईं। मणिराम सिंह (बदला नाम) कहते हैं कि घर नहीं था किराए के मकान में रहते थे। बेटा है नाती भी लेकिन उन्हें कोई मतलब नहीं।

हर माह आते हैं आवेदन

वृद्धाश्रम कभी खाली नहीं रहता। हर महीने यहां निवास के लिए आवेदन आते हैं। इनकी संख्या एक से लेकर 8 तक हो रही है। जनवरी से लेकर सितंबर तक 20 आवेदन आ चुके हैं। 10 बुजुर्गाें को निराश्रित वृद्धाश्रम में रहने का मौका मिल पाया है। इतनी ही संख्या उन बुजूर्गाें की है जो कि आवेदन देकर इंतजार में हैँ कि उन्हें कब यहां पर रहने का अवसर मिल सकेगा। क्योंकि अभी वे जहां रह रहे हैं, वहां उन्हें सुख नहीं मिलता। लेकिन जगह कम होने या नियमों के फेर में रहने का मौका नहीं मिल पाता।

कुष्ठाश्रम परिसर में निर्माण

बढ़ते आवेदनों को ध्यान में रखकर प्रशासन अब एक एकड़ जमीन पर 50 सीटर वृद्धाश्रम बनवा रहा है। इसकी बिल्डिंग तैयार हो रही है। इसके पूरा होते ही यहां पर भी बुजुर्गों को रखना प्रारंभ किया जाएगा।

वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है। इसे देखते हुए कुष्ठाश्रम के पास एक एकड़ जमीन पर अतिरिक्त बिल्डिंग तैयार की जा रह है। इसमें 50 बुजुर्गों के रहने का इंतजाम किया जाएगा।

आशीष दीक्षित, सचिव जिला रेडक्रॉस सोसायटी