
high court
जबलपुर। पटवारी बनने के लिए कुछ महीने पहले ही लाखों लोगों ने अपना भाग्य आजमाया, जिसमें बहुत से लोग सफल भी हुए हैं। पटवारी की नौकरी के लिए आए आवेदनों से बात तो स्पष्ट हो गई कि यह नौकरी बहुत अच्छी मानी जाती है। कारण फिर चाहे जो भी हो। ऐसे ही एक पटवारी ने 32 साल पहले किसी बात पर पटवारी के पद से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद उसने ३२ साल तक कोई विभागीय कार्यवाई या मानदेय या फिर पेंशन की चर्चा तक नहीं की। इसके बाद अचानक हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पेंशन दिलाने की मांग करने लगा। ६ साल तक केस चला अंतत: हाईकोर्ट ने उसकी याचिका रद्द करते हुए फैसला सुना दिया।
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1980 में इस्तीफा देने वाले पटवारी की अपील निरस्त
इस्तीफा देने के ३२ साल बाद पेंशन मांगने का अधिकार नहीं : हाईकोर्ट
यह है मामला-
मप्र हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि 1980 में नौकरी से इस्तीफा देने वाले पटवारी को 32 साल बाद पेंशन की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता व जस्टिस अखिल कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने कहा कि जिस समय इस्तीफा दिया गया, तब बीस साल की नौकरी पूरी करने के बाद पेंशन पाने का अधिकार था। लेकिन याचिकाकर्ता ने महज १५ साल ही नौकरी की थी। इसी के साथ कोर्ट ने पटवारी की अपील निरस्त कर दी।
मंडला जिला निवासी किसनलाल मरकाम ने यह अपील दायर की थी। इसमें कहा गया कि 21फरवरी 1980को उसने पटवारी पद से इस्तीफा दे दिया। तब तक वह 15साल 10 माह 11 दिन की नौकरी कर चुका था। उसे इस्तीफा देने वाले दिन ही 1430 रुपए जीपीएफ व 674 रुपए परिवार कल्याण फंड प्रदान कर दिया गया था। लंबे अरसे तक उसने कोई कार्रवाई नहीं की। 2012 में अचानक ३२ साल बाद उसने हाईकोर्ट में पेंशन के लिए याचिका दायर कर दी। इसे 13 दिसंबर 2014 को कोर्ट ने निराकृत कर दिया।
Published on:
24 Jun 2018 10:23 am

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