इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे और उन्होंने यहां 100 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले वीरांगना दुर्गावती के स्मारक की आधारशिला रखी। ऐसे शुभ अवसर पर उनकी वीरता का यह किस्सा आपको दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देगा...
रानी दुर्गावती इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज ऐसा नाम जिन्होंने भारत में राज करने वाले मुगल शासकों को मुंह की खाने को मजबूर कर दिया। इतिहास यह भी कहता है कि आज गोंड राजवंश की इस महान रानी दुर्गावती को लोग लेडी महाराणा प्रताप का दर्जा भी देते हैं। उनके साहस और बलिदान के किस्से लोगों की जुबां पर आज भी चढ़े हैं। आपको बता दें कि आज हम उनकी चर्चा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आज रानी दुर्गावती का जन्मदिन है। मप्र की धरती पर जन्म लेने वाली इस बहादुर रानी का आज 500वीं जयंती है। इस अवसर पर केंद्र सरकार की ओर से रानी दुर्गावती मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे और उन्होंने यहां 100 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले वीरांगना दुर्गावती के स्मारक की आधारशिला रखी। ऐसे शुभ अवसर पर उनकी वीरता का यह किस्सा आपको दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देगा...
- आपको बता दें कि रानी दुर्गावती का जन्म बांदा जिले के कालिंजर किले में 5 अक्टूबर 1524 में हुआ था।
- उनका जन्म दुर्गाष्टमी के दिन हुआ, इसीलिए उनके परिजनों ने उनका नाम दुर्गावती रखा था।
- दुर्गावती के पिता कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल थे और रानी दुर्गावती अपने पिता की इकलौती संतान थीं।
- आपको बता दें कि भारत के इतिहास में मुगलों को चुनौती देने वाले शासकों की लिस्ट में जिस तरह महाराणा प्रताप का नाम लिया जाता है, शिवाजी का नाम लिया जाता है, इस लिस्ट में रानी दुर्गावती का नाम भी शामिल है।
- इतिहास बताता है कि जिन्होंने अकबर की सेना का नाक में दम कर दिया था।
- रानी दुर्गावती ने ना केवल आखिरी दम तक मुगल सेना को रोक कर रखा, बल्कि मुगल सम्राट अकबर की उनके राज्य पर कब्जा करने की हसरत को कभी पूरा नहीं होने दिया।
बहादुरी के ये किस्से
- बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी जैसी युद्ध कलाओं में प्रवीण थीं। दुर्गावती के पति दलपत शाह का मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशजों के 4 राज्यों, गढ़मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला में से गढ़मंडला पर अधिकार था। रानी दुर्गावती को पति की मौत के बाद गढ़मंडला का शासन संभालना पड़ा। उस समय उनके पुत्र की आयु केवल 5 साल थी। उनके राज्य का केंद्र वर्तमान जबलपुर था। रानी ने 16 साल तक इस क्षेत्र में शासन किया और एक कुशल प्रशासक की अपनी छवि निर्मित की।
शेर का करती थीं शिकार
रानी दुर्गावती के किस्से उनके शासन से ज्यादा उनके पराक्रम और शौर्य के किस्से सुनाई देते हैं, पढ़े जाते हैं। कहा जाता है कि कभी उन्हें कहीं शेर के दिखने की खबर मिलती थी, तो वे तुरंत शस्त्र उठा कर चल देती थीं और जब तक उसे मार नहीं लेती थीं, पानी भी नहीं पीती थीं।
जब अकबर ने रानी को भेजा सोने का पिंजरा
मानिकपुर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां ने रानी दुर्गावती के विरुद्ध अकबर को उकसाया। रानी के सौंदर्य की तारीफ की। तब से अकबर ने ठान लिया था कि वह रानी दुर्गावती भी अन्य राजपूतों की विधवाओं की तरह उसके रनिवासे की शोभा बने। इतिहास में दर्ज इस किस्से के मुताबिक अकबर ने रानी दुर्गावती को एक सोने का पिंजरा भेजा और यह भी कहलवाया था कि रानियों को महल के अंदर ही सीमित रहना चाहिए, लेकिन दुर्गावती ने इसका तीखा जवाब दिया। रानी दुर्गावती के जवाब से अकबर तिलमिला उठा।
- अकबर वैसे भी अपना साम्राज्य का दक्षिण में विस्तार कर ही रहा था और मालवा पर कब्जा कर चुका था। तब उसने गोंडवाना को भी अपने कब्जे में करने के लिए आसिफ खां को गोंडवाना में आक्रमण करने का आदेश दिया। रानी दुर्गावती अकबर की सेना ने जब गोंडवाना पर हमला किया, तब हमले के दौरान दुर्गावती ने अपने बेटे नारायण के साथ घोड़े पर सवार होकर तलवार से मुगल सेना पर ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया।
- रानी दुर्गावती के साहस ने मुगल सेना को इतना पस्त कर दिया कि सेना में हाहाकार मच गया सेना इधर से उधर दौडऩे लगी। इस हार से घबराकर आसिफ खां ने रानी को शांति का प्रस्ताव भेजा, लेकिन रानी ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बाद आसिफ खां ने कुछ दिन बाद दूसरी बार हमला किया और फिर मुंह की खाई। और जब आत्मसम्मान के लिए दिया ऐसा बलिदान कहा जाता है कि तीसरी बार आसिफ खां ने पहले से दोगुनी ताकत से गढ़मंडला पर हमला किया। इस युद्ध में रानी के वीर पुत्र वीर नारायण ने सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया और खुद भी वीरगति को प्राप्त हुए।
- 24 जून 1564 को हुए हमले में रानी ने केवल 300 सैनिकों साथ सैंकड़ों मुगल सैनिकों को मारा और बहादुरी से लड़ रही थीं कि अचानक एक तीर उनकी आंख में आ लगा, लेकिन उन्होंने खुद को दुश्मनों को जिंदा पकडऩे नहीं दिया। उन्होंने मुगल शासकों के हाथ आने के बजाय मौत को गले लगाया और अपनी ही कटार से अपनी छाती पर वार करते हुए आत्मसम्मान के लिए बलिदान दे दिया।
- वर्तमान में जबलपुर के पास मंडला रोड पर स्थित रानी की समाधि बनी है।