
rani durgavati universaty
जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय को डिजिटल मोड पर लाने की कवायद काफी धीमी है। विश्वविद्यालय प्रशासन केवल मार्कशीट और डिग्रियों की प्रिंटिंग पर ही हर साल 50 लाख रुपए खर्च कर रहा है। इसमें यदि अन्य पेपर वर्क को जोड़ दिया जाए तो एक साल का कुल खर्च 60 लाख रुपए तक पहुंच जाता है। इस भारी भरकम खर्च को रोकने के लिए राजभवन की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन को डिजीटल मोड पर लाने की कवायद की जा रही है। लेकिन, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय इसे लेकर गम्भीर नहीं हैं। पूरा साल इस पर सोच-विचार में ही गुजर गया। इस सम्बंध में अभी तक कोई टेंडर भी नहीं निकाला गया। जबकि, प्रदेश के कुछ विश्वविद्यालयों ने डिजीटल मोड पर काम शुरू कर दिया है।
खर्च कम करने की कवायद
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय प्रशासन को को शासन से करीब 6.5 करोड़ रुपए हर साल दिए जाते हैं। इसमें से चार करोड़ रुपए कर्मचारियों के वेतन और पेेंशन पर खर्च हो जाते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों की भी है। इन सब बातों को देखते हुए विश्वविद्यालयों को ऑटोमेशन की दिशा में ले जाने के लिए कवायद राजभवन द्वारा की जा रही है।
जानबूझकर देरी की आशंका
जानकारों की मानें तो विश्वविद्यालय के ऑटोमेशन में जान बूझकर देरी की जा रही है। व्यवस्था लागू होने से टेंडर प्रक्रिया में मिलने वाला मोटा कमीशन मारा जाएगा। उधर, काम में पारदर्शिता बढऩे से बाबुओं, और कर्मचारियों की सेटिंग पर भी विराम लग जाएगा।
डिजिटल मोड से फायदा
- छात्र-छात्राओं की डिग्रियां और मार्कशीट ऑनलाइन सुरक्षित रहेंगी।
- एडमिशन के दौरान दस्तावेज लाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
- शहर से बाहर छात्र दस्तावेजों का ऑनलाइन वेरीफिकेशन करा सकेंगे।
- डिजिस्टल सिग्नेचर की व्यवस्था मिलेगी
इसलिए पिछड़ रहे
- व्यवस्था के लिए बजट की कमी का बहाना
- तकनीकी व्यवस्था के लिए इच्छाशक्ति की कमी
- टेंडर प्रक्रिया नहीं होना
काम में आएगी पारदर्शिता
विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. राकेश वाजपेयी के अनुसार ऑटोमेशन से काम में पारदर्शिता आएगी। इसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को एजेंसी तय करना है। चुनाव के बाद टेंडर जारी होंगे।
Published on:
26 Apr 2019 06:36 pm
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