5 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संस्कारधानी के रंगमंच ने देश को दिए कई कलाकार, अभिनय-निर्देशन में छोड़ी छाप

संस्कारधानी का रंगमंच औऱ अभिनय से गहरा नाता रहा है। यहां के रंगमंच और कलाकारों ने अपने दमदार अभिनय, नाट्य निर्देशन की छाप पूरे देश मे छोड़ी है। संस्कारधानी के रंगमंच से उभरे कई कलाकारों ने बॉलीवुड में खासी शोहरत हासिल की। आज भी शहर के रंगमंडल मंच पर अभिनय कला का जलवा बिखेर रहे हैं।  

4 min read
Google source verification
,premnath with jabalpur artists

premnath with jabalpur artists

अभिनेता प्रेमनाथ का मिला था सहयोग
जबलपुर। संस्कारधानी का रंगमंच औऱ अभिनय से गहरा नाता रहा है। यहां के रंगमंच और कलाकारों ने अपने दमदार अभिनय, नाट्य निर्देशन की छाप पूरे देश मे छोड़ी है। संस्कारधानी के रंगमंच से उभरे कई कलाकारों ने बॉलीवुड में खासी शोहरत हासिल की। आज भी शहर के रंगमंडल मंच पर अभिनय कला का जलवा बिखेर रहे हैं। संस्कारधानी के रंगकर्मियों में मनोहर महाजन,देवेंद्र गांगुली, समर सेनगुप्ता, श्याम किशोर गुप्ता, वसंत काशीकर जैसे नाम देश भर में अपनी कला के लिए जाने जाते हैं। जबलपुर के अभिनेता प्रेमनाथ ने भी अपने समय मे यहां के रंगमंच और रंगकर्मियों का खासा सहयोग दिया था।

निठल्ले की डायरी के 30 वर्ष-
पिछले कुछ वर्षों में शहर का रंगमंच और भी परिपक्व हुआ है। वरिष्ठ रंगकर्मियों को युवा पीढ़ी का साथ मिला, तो कई नए नाटकों का सृजन और मंचन हुआ, वहीं कुछ नाटक ऐसे भी रहे, जिनकी धाक रंगमंच पर वर्षों से कायम है। बीते कुछ वर्षों में शहर के नाट्य प्रेमियों को निठल्ले की डायरी, ऐतिहासिक नाटक पानीपत और तुगलक,महाब्राह्मण, सराय, किस्सा ए कबीर, वाह उधमसिंह वाह से लेकर भव्यता से सजा नाटक कादम्बरी देखने को मिला, वहीं दूसरी भाषाओं तक भी शहर के रंगमंच ने पहुंच बनाई। निठल्ले की डायरी नाटक ने इस वर्ष देश मे लगातार मंचन के 30 वर्ष पूरे किए हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि है। शहर में लगातार राष्ट्रीय नाट्य समारोह आयोजित हो रहे हैं, जिनमें देश के जाने-माने नाट्य कर्मियों का काम भी देखने को मिलता है।


प्रेमनाथ को देखने मालवीय चौक तक कतार-
वरिष्ठ रंगकर्मी पंकज स्वामी बताते हैं कि जबलपुर में आधुनिक रंगकर्म की शुरुआत 1960 में हुई। यहां की एम्पायर टाकीज के मालिक अभिनेता प्रेमनाथ रंगकर्मियों का बेहद सहयोग करते थे। 1963 में श्याम खत्री ने ‘राह के कांटें’ का लेखन व निर्देशन किया था। इस नाटक का मंचन शहीद स्मारक में हुआ। ‘फिल्म अभिनेता प्रेमनाथ शहीद स्‍मारक में पहले मंचन के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। इससे पूर्व प्रेमनाथ कभी भी जबलपुर में किसी नाटक के मंचन में दर्शक के रूप में उपस्थित नहीं हुए थे।
‘राह के कांटे’ में श्याम खत्री के स्कूली मित्र श्याम किशोर गुप्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। नाटक शुरू होने के पूर्व खिड़की खुल गई और सोचा गया कि कुछ टिकटें शायद बिक ही जाएं। लेकिन अखबार में प्रेमनाथ के नाटक देखने आने की खबर के चलते देखते-देखते खिड़की के सामने लाइन लगना शुरू हो गई और अंत में यह लाइन मालवीय चौक तरफ वाले दरवाजे तक पहुंच गई। शहीद स्मारक के अंदर लोगों को बैठने की जगह नहीं मिल रही थी। काफी लोग खड़े हुए थे। उससे चौगुनी भीड़ बाहर टिकट लेने की जद्दोजहद में लगी हुई थी। नाटक शुरू होने के ठीक पहले प्रेमनाथ शहीद स्मारक पहुंच गए। नाटक जैसे ही समाप्त हुआ, पूरा शहीद स्मारक तालियों से गूंज उठा। प्रेमनाथ को पात्र परिचय के समय मंच पर आमंत्रित किया गया। प्रेमनाथ प्रस्तुति से प्रभावित हुए और उन्होंने प्रशंसा की। प्रेमनाथ को तीन अभिनेताओं श्याम किशोर गुप्ता, देवीदयाल झा और राकेश श्रीवास्तव ने विशेष रूप से प्रभावित किया। उन्होंने मंच पर हीतीनों अभिनेताओं को बंबई आमंत्रित किया और कहा कि उन्हें वे ‘एक दिन का बंबई का सुल्तान’ बनाएंगे। तीनों अभिनेता अलग-अलग बंबई गए और प्रेमनाथ की मेजबानी में वे ‘एक दिन का सुल्तान बने।


किया भरपूर सहयोग-
इस नाटक के पश्‍चात् प्रेमनाथ का जबलपुर के रंगमंच से आत्मीय संबंध बन गया। प्रेमनाथ कलाकारों को पृथ्वी थिएटर के अनुभव सुनाते रहते थे। प्रेमनाथ कई बार श्याम खत्री सहित अन्य रंगकर्मियों से कहते थे- घोड़ा अस्तबल में नहीं बिकता, बाज़ार में बिकता है।‘’ उनके यह कहने का आशय यह था कि जो लोग फिल्म’ में जाना चाहते हैं, वे यहां अपना समय खराब कर रहे हैं। जो स्ट्रगल आप यहां कर रहे हैं, वह स्ट्रगल बंबई में करें। प्रेमनाथ दिल खोलकर जबलपुर के रंगकर्मियों की मदद करते थे।कई बार उन्होंने अपनी टॉकीज को नाटक की रिहर्सल के लिए फ्री में दिया। बाद के समय में प्रेमनाथ जबलपुर के सभी रंगकर्मियों से खुल गए थे।
आ चुके हैं कई कलाकार-
रंगकर्मियों ने बताया कि शहर में लंदन के एकेडमी ग्रुप द्वारा नाटक उसने कहा था का मंचन किया जा चुका है। इसके अलावा यहां राष्ट्रीय नाट्य समारोहों में रघुवीर यादव, मनोज बाजपेयी, आशीष विद्यार्थी, नादिरा बब्बर, कुमुद मिश्रा, शुभ्रज्योति बराट जैसे दिग्गज आ चुके हैं।

ये रंगमंडल हैं सक्रिय-
विवेचना रंगमंडल, विवेचना थियेटर ग्रुप, समागम रंगमंडल,
जिज्ञासा, विमर्श, आयुध कला मंच,
रंगा भरण, इलहाम, रंग विनोद, नाट्य लोक
,रंग पथिक, रचना

जबलपुर की नाट्य संस्था विवेचना ने रंगमंच को नया रंग दिया। हरिशंकर परसाई के कई व्यंग्य यहां नाट्य रूपांतरित कर मंचित किए गए।अरुण पांडे जैसे नाट्य निर्देशक ने कई बेहतरीन प्रस्तुुतियों के जरिये वाह-वाही लूटी। हिमांशु राय ने भी इस दिशा में सराहनीय कार्य किया। यहां से कई अभिनेता निकले और मुंबई तक पहुंचे। नरोत्तम बेन बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं।जबलपुर के डा.प्रशांत कौरव ने रंगमंच पर पीएचडी की डिग्री हासिल की, जिसमें जबलपुर के रंगकर्म पर काफी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं।

एक भी सभागार में नहीं व्यवस्था-
जबलपुर में तीन सक्रिय रंग-मंडलियां हैं। साल में तीन राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव का आयोजन होता है। समागम रंगमंडल का रंग-समागम, विवेचना की ओर से आयोजित रंग-परसाई व राष्ट्रीय नाट्य समारोह। इन नाट्योंत्सवों में देश के अलग-अलग शहरों के नाट्यदल अपने नाटकों का प्रदर्शन करतें हैं। यहाँ कुल तीन सभागार हैं। पहला, शहीद स्मारक ट्रस्ट का सभागार, दूसरा तरंग जो मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी का सभागार है और तीसरा नगर निगम का सभागार मानस भवन है।इनमे से किसी भी सभागार में प्रकाश और ध्वनि यंत्रों की समुचित व्यवस्था नहीं है। पूर्वाभ्यास के स्थानों का कोई निश्चित स्थान नहीं है। कभी किसी स्कूल का मैदान, कभी कोई हॉल यहाँ पूर्वाभ्यास स्थल बनता है।