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तबाही मचा सकते थे ये 14 हजार बम, इस हाल में फैक्ट्री में थे रखें

ओर्डिनेंस फैक्ट्री में जिन बमों के पिछले वर्ष हुए थी सीरियल ब्लास्ट वैसे रिजेक्ट बम किए गए नष्ट

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ओएफके में पिछले साल जैसी तबाही मचा सकते थे ये 14 हजार बम,
जिन बमों ने पिछले साल ओएफके में मचाई थी तबाही, वैसे 14 हजार बम किए गए नष्ट
ओएफके में एक साल पहले हुआ था बड़ा हादसा
14 हजार रिजेक्टेड बम नष्ट, बड़े खतरे का खात्मा


जबलपुर. 25मार्च 2017 की शाम जिस घटना से पूरा शहर सहम गया था, उस घटना से आयुध निर्माणी खमरिया (ओएफके) ने बड़ा सबक लिया है। निर्माणी और एक्प्लोसिव डिपो खमरिया में रखे 14 हजार रिजेक्टेड बमों को प्रबंधन ने सुरक्षित ढंग से नष्ट करा दिया है। इस काम को निर्माणी के विशेषज्ञ कर्मचारियों ने अंजाम दिया। अब आगे की प्रक्रिया महाराष्ट्र के सीएडी पुलगांव में चल रही है।

शहर के लिए खतरा
खमरिया में वर्षों पुराने बमों का भंडार है। इसमें ज्यादातर बमों का उत्पादन यहीं हुआ। कुछ एेसे थे जो दूसरी निर्माणियों लॉन्ग पू्रफ रेंज (एलपीआर) में टेस्टिंग फायरिंग के लिए लाए गए थे। पुराना गोला-बारूद पूरे शहर के लिए खतरा था। घटना के बाद रक्षा मंत्रालय भी सोचने को मजबूर हुआ कि पुरानी मैग्जीन में वर्षों पुराने बमों को कैसे ठिकाने लगाया जाए।

60-70 फीसदी नष्ट
रिजेक्ट बमों को ठिकाने लगाने के लिए पहले कई बार प्रयास हुए, लेकिन उसे अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका। कभी इन्हें विदेशी कंपनी के हवाले करने की बात कही गई तो कभी रोबोट के जरिए नष्ट करने का सपना दिखाया गया। हालांकि, बाद में खमरिया के ही कर्मचारियों की एक टीम का गठन किया गया। अब तक ६० से ७० फीसदी बमों को नष्ट किया जा चुका है।

एेसे चली प्रक्रिया
इन बमों को सुरक्षित ढंग से मैग्जीन से निकाला गया। इस राउंड यानि बम को खोला गया। प्रोपलेंट को फैक्ट्री के विशेषज्ञ कर्मचारियों ने निकाला। इसमें निकले केमिकल और हल्के बारूद को भाप के जरिए निकाला गया। फिर से एकत्रित कर फैक्ट्री परिसर में बने बर्निंग ग्राउंड में जलाकर नष्ट किया जाता है। वहीं सेल वाला हिस्सा जिसमें बहुत अधिक मात्रा में बारूद भरा होता है, उसे ब्रेक डाउन करने का काम सीएडी पुलगांव में किया जा रहा है। सेल को यहां से भेजा जाता है। वहां सेना के बम डिस्पोजल के विशेषज्ञ एवं सीएडी के कर्मचारी इस काम को कर रहे हैं।

इन बमों का जखीरा

आरसीएल
ओएफके में तैयार आरसीएल टैंक भेदी बमों का उत्पादन फैक्ट्री में होता था। फिर सेना ने इसे लेना बंद कर दिया। जितने बम तैयार थे, वह फैक्ट्री में ही रह गए। इनकी संख्या लगभग १५ हजार है। इसमें से करीब ११ हजार ६०० बमों को नष्ट किया जा चुका है।

105 एमएम टीके-एचईएसएच
यह भी टैंक एमुनेशन है। इसका उत्पादन भी फैक्ट्री में होता था। लेकिन, बंद होने के बाद बड़ा लॉट यहां था। इन्हें पुरानी मैग्जीन में संग्रहीत किया गया था। इन बमों की संख्या दो हजार से ज्यादा है। अब तक करीब ८०० बम ठिकाने लगाए जा चुके हैं।

क्लस्टर बम्बलेट
तीसरा प्रमुख बम जिसका संग्रह बडे़ पैमाने पर है, वह है क्लस्टर बम्बलेट। इसका इस्तेमाल वायुसेना करती है। एक बम को फाइटर प्लेन से छोडऩे के बाद उसमें ५० से १०० छोटे-छोटे बम निकलते हैं। इनसे बड़ी इमारत नष्ट किया जा सकता है।

छोटे-बडे़ कई बम
इसी प्रकार के हजारों की संख्या में बमों का भंडारण यहां पर है। किसी वजह से जब इनमें आग लगती है तो वह बड़ा खतरा बन जाती है।

एफ-3 की मैग्जीन में हुआ था हादसा
25 मार्च 2017 की शाम को फैक्ट्री के फिलिंग सेक्शन की मैग्जीन नम्बर 845 में हादसा हुआ था। इसमें एल-70 और 106 एमएम आरसीएल बम के पुराने वर्जन के बमों में आग लग गई थी। हजारों की तादाद में बम नष्ट हो गए थे। अनुमान के अनुसार 200 से 300 करोड़ का नुकसान हादसे में हुआ था। अभी तक कारणों का खुलासा नहीं हुआ।