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नागों की बामियों के पास स्थापित हैं मार्कण्डेयधाम के शिवलिंग

कालसर्प दोष के लिए प्रसिद्ध हैं जबलपुर में नर्मदा किनारे स्थित मंदिर, तिलवारा घाट व गौरीघाट के मंदिरों में लोगों की है गहरी आस्था    

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जबलपुर। शहर में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहांं विशेष रूप से नागदेवता का पूजन किया जाता है। नर्मदा का दक्षिण तट तिलवाराघाट स्थित मार्कण्डेय धाम ओमकारेश्वर और त्रयंबकेश्वर की तरह कालसर्प दोष पूजन के लिए प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि हजारों वर्ष पुराने बरगद के पेड़ के नीचे जहां शिवलिंग विराजे हैं वहीं वासुकी नागपास यंत्र भी है। इस क्षेत्र में सर्पों की बामियां भी बड़ी संख्या में देखी जा सकती हंै। यह ऐसा स्थल है जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के रेवा खंड में मिलता है। इसी तरह गौरी घाट के उत्तर तट में स्थित नाग मंदिर भी नागपंचमी पर पूजा के लिए प्रसिद्ध है।

मार्कण्डेय की तपोभूमि
स्कंद पुराण में उल्लेख है कि नर्मदा तट में महर्षि मार्कण्डेय ने कई वर्ष तक तपस्या की है। परमहंस सीतारामदास दद्दा की समाधि स्थल के समीप स्थित इस मार्कण्डेय धाम को कालसर्प दोष शांति व नवग्रह पूजन के लिए जाना जाता है। यहां स्थित बरगद के वृक्ष की खासियत है कि यहां मार्कण्डेय ऋषि सहित 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की है। जानकार बताते हैं कि नर्मदा के उत्तर और दक्षिण तटों का अलग महत्व है। जहां उत्तर में देवताओं ने तपस्या की है वहीं दक्षिण में यज्ञ, गंधर्व, नाग, ऋषियों, महर्षियों और सिद्धों ने तपस्या की है।

आंसू की बूंदों से शिव हुए प्रकट और दिया वरदान
पुराणों के अनुसार मार्कण्डेयजी को 12 वर्ष की आयु में मृत्यु का योग था। जब उन्हें काल लेने आया तो वे उस समय शिव का पूजन कर रहे थे। काल को समीप देखकर वे डर गए और शिवलिंग से लिपट गए। इस बीच उनके आंसू की बूंदें शिवलिंग पर पड़ी जिससे शिव का अभिषेक हुआ और वे प्रकट हो गए। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसी समय मार्कण्डेय ऋषि को अमरता का वरदान दिया। भगवान शंकर की कृपा से उन्होंने कई वर्षों तक नर्मदा के तटों पर तपस्या की। तिलवारा के पास उन्होंने कई वर्ष तपस्या की। इसलिए इस क्षेत्र को मार्कण्डेय धाम के नाम से जाना जाता है।

गौरीघाट नाग मंदिर
गौरीघाट तट पर स्थापित नाग मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। नाग पंचमी के अवसर पर मंदिर में लोगों का तांता लगा रहता है। मान्यता है कि मंदिर में गुलाब के फूल चढ़ाने से लोगों की मन्नतें पूरी होती है। मंदिर के पुजारी आशीष मिश्रा ने बताया कि नाग मूर्ति में प्रसाद व चढ़ोत्तरी चढ़ाना वर्जित है। लोग अपनी मन्नत लेकर आते हैं और इच्छाशक्ति जितने दिन भी एक गुलाब चढ़ाने का संकल्प लेते हैं। मन्नत पूरी होने पर संकल्प पूर्ण करना आवश्यक है। यहां चालीस दिन तक गुलाब चढ़ाने की परम्परा है। नाग पंचमी में मंदिर में स्थापित नाग मूर्ति के दर्शन का विशेष महत्व है। दूर-दूर से लोग दर्शन के लिए मंदिर आते हैं। सोमवार को नागपंचमी के अवसर पर सुबह से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी।


कालसर्प दोष के पूजन के लिए नर्मदा सबसे पवित्र है। नर्मदा का दूसरा नाम अमृता भी है जो कभी मृत न हो। इसलिए यहां किया गया पुण्य भी अक्षय होता है। यह पौराणिक है और इसका उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। नागपंचमी के दिन होने वाली विशेष पूजा में हजारों श्रद्धालु शामिल होंगे।
-आचार्य विचित्र, मार्कण्डेय धाम तिलवाराघाट