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विदेशों में भी कव्वाली पेश कर चुके साबरी ब्रदर्श, पत्रिका से बातचीत में कहीं ये बड़ी बातें

सांस्कृति महोत्सव में शामिल होने पहुंचे थे जबलपुर

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Qawwal Amin Sabri

Qawwal Amin Sabri

जबलपुर। 'लोग कहते हैं कव्वाली खत्म हो गई। मैं कहता हूं कि नहीं। स्विटजरलैंड, अमेरिका जैसे देशों में कव्वाली पेश करके आया हूं। लेकिन, सही रूप में कव्वाली करने वाले हों। जो लोग तोड़ मरोड़ कर कव्वाली करते हैं, उसे मैं कव्वाली नहीं मानता। मैंने फिल्मों में भी सूफियाना कव्वाली गाई है। 'राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव में जयपुर से कव्वाली पेश करने आए साबरी ब्रदर्स के अमीन साबरी ने ये बातें कहीं।

पत्रिका से बातचीत में बोले साबरी
पत्रिका से बातचीत में अमीन साबरी ने कहा कि कव्वाली उनके जीवन में श्रद्धा और भक्ति है। इसमें साधु संतों की वाणी है, मन की आराधना है। सही तरीक से कव्वाली करने वालों की दरकार है। कव्वाली अपना मकाम रखती है। गजल हो या भजन गाने वाले, कव्वाली स्टाइल में कते, असार सुनाते हैं, वो भी कव्वाली से जुड़ी हुई है।
कव्वाली में कॅरियर बनाने वालों के लिए बहुत उम्मीदें हैं। बुजुर्गों, उस्तादों की खिदमत और मेहनत करें तो बरकत होगी।

सारे कौम के बच्चों को सिखाते हैं कव्वाली
उस्ताद अमीन साबरी ने बताया, 86 वर्ष उम्र के उनके वालिद हाजी सईद सारे कौम के बच्चों को नि:शुल्क कव्वाली सिखाते हैं। युवा कव्वाली सीख रहे हैं और दर्शक भी हैं। फिलहाल में उनके बड़े भाई फरीद एवं उन दोनों के पुत्र ही साबरी ब्रदर्स की टीम में हैं।
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कॅरियर के लिए नगीने का काम किया
कॅरियर की शुरूआती दौर में हमें भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। बैल गाडिय़ों से सफर कर कव्वाली करने जाते थे। मजदूरी और नगीने का काम करके पैसा कमाते थे। हालांकि, कव्वाली में कैश पेमेंट मिलता था और यह चूल्हा जलाने का जरिया बन गया।