
State's first lakh gene bank is being prepared in the city
मयंक साहू@जबलपुर. प्रदेश में लाख का पहला जीन बैंक शहर के राज्य वन अनुंसधान संस्थान के वन परिक्षेत्र में तैयार किया जा रहा है। इसमें देशभर की लाख की विभिन्न प्रजातियों को संग्रहित करने के साथ इसके उत्पादन और मार्केटिंग पर भी फोकस किया जाएगा। संस्थान के वैज्ञानिकों की एक टीम अध्ययन कर रही है कि लाख की कौन-सी प्रजाति किसानों के लिए बेहतर होगी। जीन बैंक के निर्माण में परियोजना अन्वेषक वैज्ञानिक डॉ. अनिरुद्ध मजूमदार, सहायक संचालक अमित कुमार सिंह, डॉ. अनिरुद्ध सरकार, बलराम लोधी और भारत सिंह आर्मो शामिल हैं। डॉ. मजूमदार ने बताया कि आइसीएआर और आइआइएनआरजी के सहयोग से लाख जीन बैंक की स्थापना की गई है। इसमें कुसुम, पलाश, बेर, रैन ट्री, गुलर, सेमियालता, आकाशमोनी, खैर, घोंट समेत 16 होस्ट ट्रीज का रोपण किया गया है।
जिले में अपार संभावनाएं
जबलपु में लाख के उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। किसान क्षेत्र में उपलब्ध पलाश और बेर के पेड़ों पर लाख की खेती कर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान में जिले में डोगरबडेरा, पनागर, कछारगांव, सिहोरा के ग्राम कुआं और कुंडम के किसान लाख की खेती कर रहे हैं। वृक्षों की स्थिति के अनुसार एक वृक्ष से चार हजार रुपए से 20 हजार रुपए तक आय होती है।
महाकोशल का 80 फीसदी योगदान
महाकोशल क्षेत्र में लाख का उत्पादन मुख्य रूप से जबलपुर, सिवनी, बालाघाट, मंडला, डिंडोरी, छिंदवाड़ा, नरसिंहपुर और शहडोल में किया जा रहा है। नर्मदापुरम, अनूपपुर आदि जिलों में भी लाख की खेती होती है। प्रदेश में लाख के उत्पादन में 80 प्रतिशत योगदान महाकोशल क्षेत्र कहा है। यहां 95.34 फीसदी रंगीनी और 4.64 फीसदी कुसमी प्रजाति की लाख की खेती होती है। विभाग द्वारा किए गए सर्वे में किसानों और संग्राहकों की कुल वार्षिक आय का 20-30 फीसदी लाख उत्पादन, संग्रहण से प्राप्त हो रहा है।
-लाख के पहले जीन बैंक का निर्माण जबलपुर में हो रहा है। प्रदेशभर में लाख के उत्पादन की प्रचुर संभावनाएं हैं। संस्थान में स्थानीय कृषकों को लाख की खेती के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
-रविंद्रमणि त्रिपाठी, डिप्टी डायरेक्टर, एसएफआरआइ
Published on:
08 Dec 2022 12:19 pm
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