
duldul ghodi
बरसों से चली आ रही लोककला अब विलुप्त होने की कगार पर
जबलपुर।
महाकोशल अंचल में पुरातन काल से ही विभिन्न रूपधारण करके लोकनृत्य करने की परंपरा है। इन नृत्यों के बिना कोई मेला, त्यौहार, समारोह, संस्कार संपूर्ण नहीं माना जाता। संस्कारधानी में दुलदुलघोड़ी लोकनृत्य समारोहों की शान माना जाता रहा है। दुलदुल घोड़ी नृत्य को घोड़ी नृत्य, लिल्ली घोड़ी नृत्य आदि नामों से भी जाना जाता है। आधुनिकता और भौतिकता की दौड़ के बावजूद कुछ कलाकर इस परंपरा को अब भी जीवंत बनाए हुए हैं। खासकर, शादी-विवाह के सीजन में दुलदुल घोड़ी का नृत्य इन कलाकारों के लिए आय का जरिया भी है। इसके अलावा, धार्मिक, सामाजिक आयोजनों में यह नृत्य देखा जा सकता है।
राहगीरों के ठहर जाते हैं कदम-
दुलदुल घोड़ी नृत्य को महाकोशल अंचल और विशेषकर संस्कारधानी की पहचान माना जाता है। परम्परागत रूप से इसमें करीब एक दर्जन कलाकार होते हैं। मुख्य नर्तक अथवा कलाकार अपने शरीर पर घोड़ी के आकार का पहनावा पहनता है। सिर पर पगड़ी बांधता है। चेहरे को आकर्षक रंगों से रंगता है। धोती-कुर्ता वाली खास तरह की ड्रेस के साथ वाद्य यंत्र रमतूला, तासे और ढपला की थाप पर इनके कदम थिरकते हैं, तो राहगीरों के कदम ठहर जाते हैं। मुख मुद्राओं और अपनी अदाओं से ये दर्शकों को मोहित करते हैं। नृत्य के दौरान घोड़ी की लगाम की रस्सी को इस प्रकार से बांधा जाता है कि उसे खींचने पर कान और जीभ हिलते हैं, जिससे खट-खट की आवाज होती है।
अब प्लास्टिक की घोड़ी का चलन-
कलाकार राकेश मिस्त्री के मुताबिक घोड़ी का आकार कमर में बांधते है। वह पहले लकड़ी का बनाया जाता था, जो वजनदार भी होता था। इसे कमर में बांधकर नाचना सबके बस का नहीं होता था। अब प्लास्टिक की घोड़ी का आकार बाजार में मिलने लगा है, जो बेहद हल्का होता है। इसे कमर में बांधकर घंटों नाच सकते हैं। राकेश शहर के लगभग हर बड़े आयोजन में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।
मोर नृत्य भी शामिल-
क्षेत्रीय लोककलाओं के जानकार बताते हैं कि अंचल में दुलदुल घोड़ी, सैहरा, राई, शेर, बरेदी जैसे लोकनृत्य प्रचलित हैं। इन नृत्यों की खास बात यह है कि इनमें पूरा शरीर कपड़ों से ढंका रहता है। अब दुलदुल घोड़ी नर्तकों के दल में मोर नृत्य करने वाले भी शामिल होने लगे हैं।
मांग होने लगी कम-
शहर के दुलदुल घोड़ी नर्तक चतुर्भुज मिस्त्री आसपास के इलाकों में खासे प्रसिद्ध थे। अब उनकी विरासत उनके 5 पुत्र सम्भाल रहे हैं। उनके पुत्र राकेश मिस्त्री ने बताया कि अब दुलदुल घोड़ी नृत्य के प्रति लोगों का पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। अब लोग कम ही बुलाते हैं। बड़े समारोहों में उन्हें जरूर अब भी बुलाया जाता है। लेकिन मेहनताना बहुत कम मिलता है। शादी-विवाह के सीजन का उन्हें इंतजार रहता है।
ग्रामीण अपना रहे-
सिवनी के दुलदुल घोड़ी नर्तक श्याम सिंह बताते हैं कि अंचल में रोजगार की कमी होने से कई ग्रामीणों ने इस कला को ही रोजगार का जरिया बना लिया है। अब वे लोगों के बुलावे पर कुछ रकम लेकर यह नृत्य प्रस्तुत करते हैं। परिवार की जरूरतें बढ़ गई हैं। महंगाई भी लगातार बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में इन कलाकारों के लिए दुलदुल घोड़ी नृत्य आजीविका का सहारा
बन गया है।
Published on:
23 Jan 2023 12:05 pm
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