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दम तोड़ रहे शहनाई के सुर, कम बचे कद्रदान

मेरे पिता अहमद शहनाई वाले के नाम से प्रसिद्ध थे। 30 वर्ष पहले शहर के एक बड़े व्यवसायी के यहां विवाह में उन्होंने जब राग भैरवी पर आधारित धुन बजाई, तो वहां उपस्थित रिकॉर्डिंग कम्पनी एचएमवी से जुड़े एक व्यक्ति खासे प्रभावित हुए। उन्होंने तत्काल पिताजी को मुम्बई आने का प्रस्ताव दिया। पिताजी मुंबई गए और उनकी शहनाई की धुनों का एक एलपी रेकॉर्ड किया गया। एचएमवी ने इसे रिलीज किया तो इसकी धूम मच गई। यह था जबलपुर की शहनाई का जलवा।

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Shahnai artists

Shahnai artists

विवाह समारोहों में अब बहुत कम सुनाई देती है शहनाई की मधुर धुन, एक समय जबलपुर के शहनाई वादकों का था जलवा

जबलपुर।
मेरे पिता अहमद शहनाई वाले के नाम से आसपास के इलाके में प्रसिद्ध थे। लगभग 30 वर्ष पहले की बात है। शहर के एक बड़े व्यवसायी के यहां विवाह में उन्होंने जब राग भैरवी पर आधारित एक धुन बजाई, तो वहां उपस्थित मुंबई की रिकॉर्डिंग कम्पनी एचएमवी से जुड़े एक व्यक्ति खासे प्रभावित हुए। उन्होंने तत्काल पिताजी को मुम्बई आने का प्रस्ताव दिया। उस समय विवाह का सीजन था और पिताजी को कई विवाहों में शहनाई बजानी थी। लेकिन सारे कार्यक्रमों को छोड़ कर मेरे पिताजी उनके बुलावे पर मुंबई गए और उनकी शहनाई की धुनों का एक एलपी रेकॉर्ड किया गया। एचएमवी ने इसे रिलीज किया तो इसकी धूम मच गई। यह था जबलपुर की शहनाई का जलवा। अहमद खान के बाद शहर में शहनाई के बचे गिने चुने कलाकारों में शुमार उनके पुत्र हनीफ ने पत्रिका से चर्चा में यह दिलचस्प वाकया सुनाया।


हनीफ कहते हैं कि अब शहनाई की धुनों के कद्रदान कम बचे हैं। पश्चिमी संगीत की चकाचौंध ने इस मधुर वाद्ययंत्र की सुरीली धुनों पर परदा गिरा दिया। अब शहर में शहनाई वादन कला दम तोड़ती नजर आ रही है।चुनिदा विवाहों में अब भी उन्हें शहनाई बजाने के लिए बुलाया जाता है। लेकिन विवाह की हर रस्मों की बजाय विशेष रस्मो और रिसेप्शन पार्टियों में।

दूसरे काम करने पर विवश कलाकार-

किसी समय शादी में गूंजने वाली शहनाई अब सिर्फ कहावतों तक सिमट गई है। शादी वाले घरों में अब शहनाई के सुर नहीं गूंजते। इसकी जगह कानफोड़ू संगीत ने ले ली है। पुरानी पीढ़ी के पास काम नहीं है और नई पीढ़ी ने इस वाद्य से पूरी तरह दूरी बना ली है। किसी समय शहर में सौ से ज्यादा शहनाई वादक थे, लेकिन अब इक्का-दुक्का ही बचे हैं। शगुन का पर्याय मानी जाने वाली शहनाई से अब बदहाली के सुर निकल रहे हैं। हालत इतने बदतर हैं कि काम नहीं मिलने से परेशान कई शहनाई वादक अन्य कार्य करने को मजबूर हैं।

हफ्ते भर पहले बुलाते थे-
शहनाई वादक अजीमुद्दीन ताजी ने बताया कि किसी समय उनके पिता की शहनाई पार्टी में 10-15 लोग होते थे। जिन घरों में शादी होती थी , वहां शादी के सप्ताह भर पहले बुला लिया जाता था। पूरे सम्मान के साथ खाने-ठहरने का इंतजाम किया जाता था। शहनाई पार्टी की जिम्मेदारी सुबह-शाम के समय घर को शहनाई की मधुर धुनों से गुंजायमान करने की होती थी। इसके बदले में सम्मानजनक राशि भी मिलती थी, लेकिन अब समय पूरी तरह से बदल गया है। हालत यह है कि ज्यादातर शहनाई वादक इस कला को छोड़ चुके हैं। जो इसे थामे हुए हैं उनके सामने रोजी-रोटी का संकट है।

शहनाई को नहीं पहचानते लोग
- शहनाई वादक सुमेरसिंह कहते हैं बदलते समय के साथ शहनाई अपनी पहचान खो चुकी है। हालत यह है कि नई पीढ़ी इस वाद्य को पहचानती तक नहीं है। उन्होंने कहा कि हाल ही में मुझे एक समारोह में शहनाई वादन के लिए बुलाया गया था। वादन शुरू करते ही लोग जमा हो गए। वे शहनाई को ऐसे देख रहे थे जैसे यह कोई नया वाद्य हो। लोग इसे पहचान ही नहीं पाए। शहनाई वादक करीम के मुताबिक शहनाई के मुकाबले अब लोग तेज संगीत सुनना पसंद करते हैं। मैंने अपने पिता से यह कला सीखी थी, लेकिन मेरे परिवार में कोई इसे सीखना नहीं चाहता।

साल में इक्का-दुक्का कार्यक्रम -
शहनाई वादकों के मुताबिक कुछ दशक पहले तक हालत यह थी कि शादी के मौसम में उनके पास समय नहीं होता था। महीनों पहले शहनाई के लिए बुकिंग हो जाती थी लेकिन अब समय बदल गया। अब साल में इक्का-दुक्का कार्यक्रम मिलते हैं वो भी घंटे- दो घंटे के लिए। रिसेप्शन, भांवर, विदाई, वलीमा जैसी रस्मो के लिए ही बुलाया जाता है। शहनाई वादक रामकृष्ण बेन कहते हैं कि बहुत बुरा लगता है जब कार्यक्रम में शहनाई वादन को बीच में रुकवाकर लोग डीजे शुरू करवा देते हैं।