बड़ी डरावनी है यह सामाजिक दूरी, दर्द इतना गहरा है कि भुलाए से नहीं भूलता!

प्रदेश सहित जबलपुर में कोरोना आए एक साल बीत गए, लेकिन अभी भी ज्यादातर संक्रमित समाज के डर से सामने नहीं आना चाहते

 

By: shyam bihari

Published: 19 Mar 2021, 07:48 PM IST

 

जबलपुर। मप्र में कोरोना का प्रवेश सबसे पहले जबलपुर शहर में हुआ था। 19 मार्च, 2020 को विदेश से लौटे चार व्यक्ति कोरोना संदिग्ध मिले थे। जांच में अगले दिन चारों के कोविड-19 पॉजिटिव होने की पुुष्टि हुई थी। इस बात को एक साल बीत गए हैं। अब तक जिले में 17 हजार से ज्यादा संक्रमित हो चुके हैं। हालांकि, इसमें से ज्यादातर स्वस्थ हो गए हैं। लेकिन, इनमें से अधिकतर 'सामाजिक दूरीÓ के दर्द से उबर नहीं पाए हैं। 'पत्रिकाÓ ने शुरुआती संक्रमण काल में कोरोना की गिरफ्त में आने वालों से बातचीत करनी चाही, तो ज्यादातर ने अपने को समाज के सामने लाने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि समाज ने तो उनके सामने पहचान का संकट ला दिया था। अभी भी स्थितियां बहुत कुछ बदली नहीं हैं। कोरोना के संक्रमण से उबरने वालों को अभी भी सामाजिक मान्यता नहीं मिल रही। जागरुकता अभियानों के बाद भी संक्रमितों को शक और भय की नजरों से देखा जाता है। इसलिए स्वस्थ होने के बाद भी लोग यह नहीं चाहते कि उनका नाम कोरोना से जोड़कर समाज के सामने लाया जाए। इसके चलते कोरोना पीडि़तों का नाम प्रकाशित नहीं किया जा रहा है।

'पत्रिका पड़ताल में पता चला कि कोरोना के शुरुआती दौर में संक्रमण की जकड़ में आने वाले अधिकतर लोग उस दौरान समाज के साथ अपने अनुभवों को कड़वा मानते हैं। वे कोरोना संक्रमण के दौर की कोई बात याद नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि संक्रमित पाए जाने के बाद समाज के बड़े वर्ग ने उनसे अघोषित दूरी बना ली थी। कुछ के साथ तो अपनों ने भी पराये जैसा व्यवहार किया था। इसलिए वे कोरोना पीडि़त होने की बात पर परदा चाहते हैं। उनका मानना है कि संक्रमित होने के कारण कोराबार में नुकसान उठाना पड़ा है। समाज के बीच रहकर भी पड़ोसियों से अलग-थलग रहे। प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचा।
ये वजहें पहचान छिपाने के लिए कर हीं मजबूर
-ग्राहक दूरी बनाते हैं।
-ज्यादातर पड़ोसी और परिजन मदद नहीं करते।
-कॉलोनी में दूध, सब्जी, पानी वाले तक को रोक दिया जाता है।
- कार्यस्थल में स्वस्थ होने के बाद भी जाने पर लोग दूर रहते हैं।
- स्वस्थ होने के बाद भी लोग मिलने से कतराते हैं।
- किराए से घर लेकर रहने वालों को जगह छोडऩे का दबाव रहता है।
- संक्रमित के परिवार के सदस्यों को भी तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।
शहर में शुरू में मिले कोरोना संक्रमितों का कहना है कि वे पॉजिटिव मिले, तो उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वे कोई अपराधी हों। समाज ने तो उन्हें दुश्मन मान लिया था। लेकिन, वक्तके साथ कोरोना को लेकर लोगों की समझ बढ़ी है। अब वे भी जिंदगी में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहते। कोरोना को मात देकर बेहद कठिन परिस्थितियों से गुजरे ज्यादातर संक्रमितों का मानना है कि कोरोना से सुरक्षा का ध्यान रखकर ही बचा जा सकता है। फिर से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। क्योंकि, केस कम हुए तो लोगों ने समझा कोरोना समाप्त हो गया है। मास्क लगाने, दो की गज की दूरी और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने से संक्रमण धीरे-धीरे फिर से जकड़ रहा है। ऐसे में जब तक सौ फीसदी टीकाकरण नहीं हो जाता, तब तक बचाव की बातों को आदत में रखें।

shyam bihari Desk
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