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गंगाधर तिलक के नाम पर पड़ा तिलक भूमि की तलैया का नाम

इतिहास के झरोखे से : लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और क्रांतिवीर चंद्रशेखर आजाद की जयंती आज

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tilak bhumi ki talyaia is famous for bal gangadhar tilak

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जबलपुर . संस्कारधानी कई क्रांतिकारी आंदोलनों की गवाह रही है। यहां सत्य और अहिंसा पर चलने वाले बापूजी का भी आगमन हुआ है, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा का नारा देने वाले सुभाष चंद्र बोस यहां कारावास काट चुके हैं। स्वाधानीता संग्राम में योगदान देने वाले योद्धाओं की भूमि रही संस्कारधानी में उनके नाम से ही कई भवन भी बने हुए हैं। जिसमें गांधी जी की लाइब्रेरी, सुभाष चंद्र बोस केन्द्रीय जेल और मेडिकल कॉलेज के साथ अन्य दूसरी स्मारकें भी हैं। इन सबके बीच दो ऐसे क्रांतिवीर भी हैं जिनका जबलपुर से गहरा जुड़ाव रहा है। इतिहास के झरोखे से इन दोनों की जयंती दिवस के उपलक्ष्य में आइए जानते हैं कुछ रोचक तथ्य..

कई गुप्त बैठकें यहां हुई सम्पन्न

इतिहासविद् डॉ. आनंद सिंह राणा ने बताया कि पं लोकमान्य तिलक और चंद्रशेखर आजाद का शहर के गहरा नाता है। कई क्रांतिकारी योजनाओं के लिए वे यहां बैठकों में शामिल हो चुके हैं, जिस बात की उपस्थिति इतिहास के पन्नों में दर्ज है। साल 1916 के बाद से 3 बार लोकमान्य तिलक का जबलपुर आगमन हुआ है, वहीं चंद्रशेखर भी कई बाद गुप्त प्रवास पर शहर आए हैं।


प्रणवेश कुमार थे चंद्रशेखर के खास मित्र
प्रणवेश कुमार चटर्जी जबलपुर से क्रांतिकारी संगठन एचआरए चलाया करते थे। इस संगठन का क्रांतिकारी कार्यक्रमों में हिस्सेदारी से चंद्रशेखर काफी प्रभावित भी हुए थे। क्रांतिकारी सोच से प्रभावित होकर चंद्रशेखर प्रणवेश के गहरे दोस्त बन गए। फिर क्या था कई क्रांतिकारी योजनाओं की गुप्त रूप से बैठकें जबलपुर में ही सम्पन्न होने लगी। इस बीच कई बार चंद्रशेखर गुप्त प्रवास से जबलपुर आया करते थे।


1925 काकोरी कांड में हुए थे शामिल
क्रांतिकारी आंदोलनों में एक शामिल था 1925 में हुआ काकोरी रेल कांड। इस रेल कांड के पूर्व भी चंद्रशेखर गुप्त प्रवास से जबलपुर आए थे, जहां प्रणवेश कुमार चटर्जी के निवास पर उनकी बैठक सम्पन्न हुई थी। जिसमें 17 लोगों की मुख्य भूमिका थी। इसमें चंद्रशेखर आजाद सहित प्रणवेश कुमार चटर्जी भी शामिल थे। लेकिन गिरफ्तारी के दौरान चंद्रशेखर किसी के हाथ नहीं लगे और प्रणवेश की गिरफ्तारी हो गई।


कुछ इस तरह तिलक आए जबलपुर
पहली बार- 2 अक्टूबर 1916 को लखनऊ कांग्रेस में आते हुए जबलपुर में उतरे और यहां सें साने के बाड़े में ठहरे।
दूसरी बार- 6 अक्टूबर 1917 में पं विष्णुदत्त शुक्ल के निवास पर ठहरे, जहां उन्होंने अलफ खां की तलैया में भाषण दिया, उस तलैया को तिलक के नाम से तिलक भूमि की तलैया रखा गया।
तीसरी बार- 3 और 4 जून 1920 को जबलपुर आकर दो भाषण दिए।