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Lungi dance से ज्यादा इस डांस की धूम, वीडियो देखकर आप भी थिरक उठेंगे

लोक संस्कृति के रंग में संस्कारधानी, मड़ई-मेलों की धूम, जगह-जगह हो रहे आयोजन, परिक्रमा करने उमड़ रहे लोग

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top ten dance numbers of india

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जबलपुर। कर गई चुल, बेबी को बेस पसंद है, मनमा इमोशन जागे, डीजे वाले बाबू, टुकुर-टुकर - ये सारे डांस नंबर्स भले ही सुपर हिट हों पर इस शहर के लोगों को कुछ और ही भाता है। मस्ती में झूमने के लिए इन्हें किसी आयटम सांग और डीजे की जरूरत ही नहीं पड़ती, ढोल-मंजीरों की गूंज पर इनके कदम अपने आप थिरकने लगते हैं। इस समय में तो मस्त होकर नाचते लोग हर कहीं नजर आ रहे हैं। महाकौशल क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुके मढ़ई मेलों में रोज यह नजारा दिखाई दे रहा है।


मंडप की करते परिक्रमा
प्रकाश पर्व दीपावली के बाद संस्कारधानी में मड़ई मेले का उत्सवमय माहौल कायम है। प्रमुख स्थानों पर वर्षों से भरते आ रहे मड़ई मेले में संस्कृति और संस्कारों का समागम है। मंगल चंडी की पूजा हो रही है तो ग्वालों की टोली गांव-मोहल्लों में लोक संस्कृति की अलख जगा रही हैं। संस्कारधानी में मड़ई मेलों की लोकप्रियता तनिक भी कम नहीं हुई। कार्तिक शुक्ल पक्ष में बिना किसी प्रचार-प्रसार के मड़ई मंडप की परिक्रमा और गृहस्थी के सामानों के साथ मिठाइया और खिलौने खरीदने वालों का तांता लगा है।


देवारी गाते हैं ग्वाल
कोंड़ी और रस्सी से बनी विशेष वेश भूषा में ग्वालों की टोली हाथों में फरसा और मृदंग की धुन पर देवारी गा रही हैं, लोक नृत्य कर रही हैं। मड़ई मेला के दौरान प्रमुख लोगों के घरों में भी संस्कृति की झलक दिख रही हैं। उन्हें लोग दक्षिणा भी दे रहे हैं।


पुराण में है महिमा
लोक गायक रुद्र दत्त दुबे बताते हैं कि ब्रह्म बैव वर्त पुराण के अनुसार भगवान शिव एक असुर से हार गए तो उन्होंने मंगल चंडी की पूजा की और उनके वरदान से शिव अपराजेय हुए। उन्होंने बताया कि उन्होंने मंगल चंडी व्रत कथा पुस्तक लिखी है। महाकौशल की अध्यात्मिक संस्कृति में मड़ई मेला का विशेष महत्व है। लोक संस्कृति ही मानव को जीवन शैली सिखाती है।


तय होते हैं रिश्ते
बुंदेल खंडी साहित्यकार द्वारिका गुप्त गुप्तेश्वर बताते हैं कि मड़ई मेलों का आयोजन आदिम काल से चला रहा है। इसमें आदिवासी और आधुनिक दौर का संगम दिखाई देता है। जहां मड़ई मेला भरता है, वहां के रिश्तेदार आमंत्रित किए जाते हैं। इसमें विवाह योग्य युवक-युवतियों के रिश्ते तय होते हैं। दीपावली के बाद नई फसल कटती है। कृषि की प्रधानता के साथ गुनिया मानव कल्याण की पूजा करते हैं। संस्कृति, सद्भाव की परम्परा कायम होती है।