24 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

देवी को प्रसन्न करने गर्म तेल की कढ़ाई में कूदा भक्त, माता ने दिया सोना

मां आसपास इलाके में बड़ी खेरमाई या हथियागढ़ वाली खेरदाई के नाम से जानी जाती रही हैं

2 min read
Google source verification
devi siddha peeth

devi siddha peeth

जबलपुर। हथियागढ़ का त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर जबलपुर शहर से करीब 14 किमी की दूरी पर भेड़ाघाट मार्ग पर "हथियागढ़" नाम की जगह पर स्थित है। मन्दिर के अन्दर माता महाकाली, माता महालक्ष्मी और माता सरस्वती की विशाल मूर्ति स्थापित है। इस मंदिर से कई किवंदंतियाँ जुडी हुई हैं।

कहते हैं राजा कर्ण जो हथियागढ़ के राजा थे, वे देवी के सामने खौलते हुये तेल के कडाहे में स्वयं को समर्पित कर देते थे। यही नहीं उनके इस कृत्य से देवी प्रसन्न होकर उन्हें (राजा को) उनके वजन के बराबर सोना आशीर्वाद के रूप मे देती थीं। मां त्रिपुर सुंदरी जो सदियों तक तेवर सहित आसपास इलाके में बड़ी खेरमाई या हथियागढ़ वाली खेरदाई के नाम से जानी जाती रही हैं, आज भी यहां के उम्रदराज लोग इसी नाम से इसे संबोधित करते हैं।

देवी की हैं ढेरों कहानियाँ
मां की अलौकिक शक्ति एवं चमत्कारों की यहां अनेक कहानियां एवं किवदंतियां आज भी सुनी जा सकती हैं। यहां पर आज भी मनोतियाँ मांगी जाती हैं और ऐसा देखा जा सकता है कि यहां मनोतियाँ पूर्ण होने के उपरांत भंडारे, विशेष पूजन-अर्चन तथा चढ़ावा का सिलसिला चलता ही रहता है। आस्था और श्रद्धा के इस स्थल में सदैव चहल पहल रहती है। लोग दूर-दूर से माँ के दर्शनार्थ दौड़े चले आते हैं।

भक्त को पुनर्जीवित किया
दानी राजा कर्ण ने पूजा के बाद सवा पहर तक सोना बरसाया था। कहा जाता है कि एक बार खौलते तेल की कढ़ाई में राजा ने अपना मस्तक काटकर जब देवी माँ को चढ़ाया तब माँ ने स्वयं प्रकट होकर भक्त को पुनर्जीवित किया तथा दर्शन दिए।

पहाड़ी छोड़कर आबादी नहीं चाहती
मां की चमत्कारी शक्तियों की अनेक कथाएं हैं। वे इस पहाड़ी स्थान को छोड़कर आबादी वाले क्षेत्र में आना ही नहीं चाहती थीं। एक बार ग्रामीण लोग माता जी को बैलगाड़ी में रखकर तेवर गांव में छोटी खेरमाई मंदिर ले कर आ गए और वहां रात भर भजन कीर्तन करते रहे। लोग जब दूसरे दिन सुबह स्नान-ध्यान करने और मां के पूजन की तैयारी करने अपने घर गए। इसके बाद जब वापस मंदिर आए तो माँ वहां से अंतर्ध्यान हो चुकी थीं। लोग घबरा गए। बाद में पता चला कि मां अपने पुराने स्थान पर स्वयं पहुंच गई हैं, ऐसी हैं तेवर की माँ त्रिपुरसुंदरी।


अपने स्थान पर विराजमान
एक कथा और सुनने को मिलती है कि अंग्रेजों के जमाने में कुछ बाहरी अनजान लोग मां को ट्रक में रख कर ले जा रहे थे परंतु कुछ ही दूरी पर ट्रक के सभी लोगों को नींद सताने लगी तब सभी लोग ट्रक को खड़ा कर सो गए और जब नींद खुली तो ट्रक में देवी मां नहीं थी। फिर ज्ञात हुआ कि वे अपने स्थान पर विराजमान हैं। जैसा मैं स्वयं जानता हूँ कि पूर्व में मां केवल एक शिलाखंड के सहारे पश्चिम दिशा की ओर मुंह किए अधलेटी अवस्था में थी।

जंजीरों के सहारे खड़ा करने की कोशिश
इसी तारतम्य में एक अन्य बात आज भी बताई जाती है कि त्रिपुरी क्षेत्र के ऐतिहासिक-उत्खनन के समय किसी उत्खनन अधिकारी ने मां को जंजीरों के सहारे खड़ा करने की कोशिश की थी तो उस अधिकारी को स्वप्न आया कि मुझे खड़ा मत करो परंतु वह नहीं माना। उसने जब मां को जंजीरों के सहारे खड़ा किया तभी अधिकारी के घर से उसके अच्छे-भले और स्वस्थ पुत्र की अचानक तबियत बिगड़ गई। बाद में उसने देवी मां को पूर्व स्थिति में रख कर उनसे क्षमा याचना और पूजन अर्चन किया तब जाकर उसके पुत्र को स्वास्थ्य लाभ हुआ।