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आधी रात मुर्दे को पकड़कर पहुंचे ससुराल फिर पत्नी ने लगायी डांट

पत्नी के दो शब्दों ने बदल दी थी गोस्वामी तुलसीदास की दुनिया, जाग उठा वैराग्य

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Prem Shankar Tiwari

Jul 29, 2017

goswami tulsidas ji

goswami tulsidas ji

जबलपुर। कहते हैं कि हर सफल व्यक्ति के पीछे नहीं न कहीं किसी महिला की प्रेरणा या उसका हाथ होता है। विश्व के महान कथाकारों और कवियों के सिरमौर गोस्वामी तुलसीदास भी इससे अछूते नहीं है। पत्नी के महज के महज दो शब्दों ने उनकी दुनिया बदल दी। उन्हें परमात्मा से मिला दिया। श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी पर रविवार को गोस्वामी तुलसीदासजी की जयंती है। आइए जानते हैं कैसे थे हमारे गोस्वामी तुलसीदास...।



जन्म से ही सही कठिनाईयां
साहित्याचार्य पं. दिनेश गर्ग के अनुसार गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म संवत् 1554 में श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी को उत्तर प्रदेश, चित्रकूट जिले के राजापुर गांव में आत्माराम दुबे के घर पर हुआ। उनकी मां का नाम हुलसी देवी था। जन्म के बाद ही मां चल बसीं। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म के कारण पिता ने भी उन्हें एक दासी को सौंप दिया और खुद सन्यासी हो गए। तुलसीदास जी ने जन्मते ही राम का नाम लिया था इसलिए उनका नाम राम बोला रख दिया गया। फकीरी में यहां वहां विचरण करते हुए राम बोला यानी तुलसीदास जी की भेंट प्रसिद्ध संत नरहरि बाबा से हो गई। वे उन्हें साथ में अयोध्या ले गए। नरहरि बाबा ने संवत 1561 को उनका यज्ञोपवीप संस्कार कराया और उनकी शिक्षा दीक्षा का प्रबंध किया। उनका नाम तुलसीदास रखा। शास्त्रों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, गुरुवार, संवत् 1583 को 29 वर्ष की आयु में राजापुर में रहने वाली कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ।



goswami tulsidas ji



.. और पकड़ में आया मुर्दा
जनश्रुति है कि नरहरि बाबा के आश्रम में रहते हुए राम बोला को की याद आई। वे पैदल ही ससुराल चल दिए। काफी रात हो गई। बारिश का दौर था। नदियां उफान पर थीं। ससुराल जाते वक्त भी एक नदी पड़ी। उसमें एक मुर्दा बहते हुए जा रहा था। तुलसीदासजी ने मुर्दा को पकड़कर नदी पार की और फिर ससुराल पहुंचे। घर के दरवाजे बंद थे। वे छप्पर से चढ़कर जाना चाहते थे, तभी उन्हें एक रस्सीनुमा चीज लटकते हुए दिखी। वे उसे पकड़कर चढ़ गए, लेकिन जैसे ही उसे छोड़ा तो मुंह से चीख निकल गई, दरअसल पर रस्सी नहीं... वह तो सांप था। चीख सुनकर पत्नी रत्नावली की नींद खुल गई।





पत्नी के इन शब्दों ने बदला हृदय
तुलसीदास ने पत्नी से रात में ही ससुराल चलने का निवेदन किया, लेकिन लोक लाज के भय से रत्नावली ने इंकार कर दिया और चुपचाप वापस चले जाने का आग्रह किया। जब तुलसीदास जी नहीं माने तो खीझ के मारे रत्नावली के मुंह से ये शब्द निकल पड़े -

अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति !
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीति...?

बस क्या था... इन शब्दों ने राम बोला, तुलसीदास को गोस्वामी तुलसीदास बना दिया..। उनका मन राम की तरफ मुड़ गया। वे सब कुछ छोड़कर राम कथा सुनाने और रामचरित मानस की रचना में जुट गए। श्री रामचरित मानस के अलावा उन्होंने 12 प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे हैं। 126 साल की उम्र में 1680 में श्रावण कृष्ण शनिवार के दिन तुलसीदास जी ने "राम-राम" कहते हुए अपने शरीर का परित्याग किया।
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