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25 हजार पौधों वाले दो उद्यान हरे-भरे, बेक द्री की भेंट चढ़ा बाकी प्लांटेशन

जबलपुर में नगर निगम व लम्हेटा में भेड़ाघाट नगर परिषद् ने थोड़ा सा किया प्रयास  

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एक बेल ऐसी, जो चार किलोमीटर फैली, जड़ कहां-पता नहीं, देखिए हकीकत

In the riparian zone, cultivation is done by cutting the plants inside the wire fencing

जबलपुर। पौधे रोपकर उसकी देखभाल शिशु की तरह करना पड़ती है। गर्मी व ठंड में पानी देना, बरसात में निंदाई, गुड़ाई देने से लेकर समय पर खाद डालना, कीट से बचाना और मवेशियों से देखभाल भी करना होता है। तीन साल की देखभाल से नया ऑक्सीजोन तैयार हो जाता है। ये कहना है जबलपुर के पर्यावरण प्रेमियों का, जिनके प्रयास से देवताल व लम्हेटा की 25-25 एकड़ वाली दो साइट में हरे-भरे उद्यान तैयार हो गए हैं। लम्हेटा में घुघवा जल प्रपात साइट पर चार साल पहले रोपे गए फलदार पौधों की बगिया तैयार हो गई है। पच्चीस एकड़ में आम, अमरूद, नीम, जामुन जैसे पौधे रोपे गए थे। 25 हजार पौधे रोपे गए थे। भेड़ाघाट नगर परिषद् के कर्मचारियों ने दिन-रात देखभाल की। ऐसे पौधे जो मर गए या जिन्हें मवेशी चर गए उनके स्थान पर नए पौधे लगाए गए। चारों ओर फें सिंग की गई। ये प्रयास रंग लाया और अब बगिया तैयार हो गई है। हालांकि नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान 2017 में लम्हेटा साइट पर जिले में पचास लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था। प्रशासन ने चालीस लाख से ज्यादा पौधे रोपने का दावा भी किया था। उनमें ज्यादातर साइट पर एक भी पौधे नहीं बचे हैं।
पहाड़ी को हरियाली की चुनरी ओढ़ाने की पहल
मदनमहल पहाड़ी की खाली हुई जमीन पर देवताल में दो साल पहले सामाजिक संगठनों की सहभागिता से स्मार्ट सिटी योजना के तहत पच्चीस एकड़ जमीन में पच्चीस हजार पौधे रोपे गए। फें सिंग की गई। वैज्ञानिकों व वन विभाग के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन मृदा उपचार कर मापदंडों के निर्धारित दूरी पर पौधे रोंपे गए। नतीजतन दो साल में इन पौधों की ग्रोथ तेजी से हुई और साइट पर बगिया तैयार हो गई है। नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान सभी विभागों को अलग-अलग स्थानों पर पौधरोपण के लिए जमीन मुहैया कराई गई थी। पुलिस महकमे को भटौली साइट में जमीन दी गई थी। लगभग दस एकड़ में पुलिस विभाग ने पौधे लगाए थे, लेकिन देखभाल नहीं होने से एक भी पौधा नहीं बचा है। निगम ने पौधरोपण के लक्ष्य के तहत मेडिकल से लेकर तिलवारा मार्ग पर सड़क के दोनों ओर पौधरोपण किया था। देखभाल न होने के कारण गिनती के पौधे ही बचे हैं।