
Dinosaures over
जबलपुर। डायनासोर लोगों के लिए कौतूहल का विषय हैं। भारी-भरकम शरीर वाले इस जीव को लेकर कई फिल्में भी बन चुकी हैं। कुछ इन्हें बेहद खतरनाक और आक्रामक प्राणी के रूप में जानते हैं। सवाल भी उठता है कि क्या वास्तव में यह खतरनाक प्राणी कभी इस धरती पर था? इस सवाल का सटीक जवाब जबलपुर में मिला है। यहां पाटबाबा की पहाड़ी पर डायनासोर का अंडा मिला है। फुटबॉल जैसे आकार का यह अंडा जीवाश्म के रूप में जबलपुर स्थित साइंस कॉलेज के म्यूजियम में संरक्षित है। कनाडियन म्यूजियम ऑफ नेचर से आए वैज्ञानिकों के एक दल ने भी इस अंडे की जांच की। अंडे का जीवाश्म करीब ७ करोड़ साल पुराना बताया गया है।
पत्थर जैसा है अंडा
साइंस कॉलेज के म्यूजियम में रखा डायनासोर के अंडे का जीवाश्म पर पत्थर जैसा है। जांच में यह बात सामने आई कि यह डायनासोर की एक विशालकाय प्रजाति का अंडा है। वर्षों तक जमीन में दबे रहने की वजह से वह पाषाणनुमा जीवाश्म में तब्दील हो गया है। साइंस कॉलेज के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. एचबी पालन के अनुसार डायनासोर के अंडे का पता गन कैरिज फैक्टरी के निर्माण के समय चला था। यह पाटबाबा की पहाड़ी पर मिला था। उस समय अंग्र्रेजों का शासन था और स्लीमन नाम के व्यक्ति कर्नल थे। ऐसा माना जाता है कि सन् 1828 में कर्नल स्लीमन ने छावनी क्षेत्र में सबसे पहले डायनासोर के अवशेष ढूंढे थे।
यहां मिले घोंसले
गे्रनाइट की लाखों वर्ष पुरानी चट्टानों से घिरे सूपाताल की पहाडिय़ों पर भी डायनासौर के घोंसले चिह्नित किए गए हैं। यहां ऐसे कई निशान मिले हैं, जो डायनासोर के होने की पुष्टि करते हैं। पाटबाबा में भी डायनासौर के घोंसले खोजे गए थे। जिनके निशान यहां अब भी मौजूद हैं। यहां कनाडियन म्यूजियम ऑफ नेचर में पुरातत्व विज्ञानियों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने सींग वाले शाकाहारी डायनासोर की एक नई प्रजाति की पहचान की है। इसके जीवाश्म की लगभग एक दशक पहले मोंटाना में खोज हुई थी। कनाडिनयन म्यूजियम ऑफ नेचर में जॉर्डन मैलोन के नेतृत्व वाले दल ने जीवाश्म का वैज्ञानिक विश्लेषण कर डायनासोर की एक नई प्रजाति की स्पष्ट व्याख्या की है। वैज्ञानिकों ने माना कि दुनिया को डायनासोर के जीवाश्म का नायाब तोहफा जबलपुर ने दिया है। डायनासोर के मामले में यह खोज पूरे विश्व के लिए शोध का एक नया आधार बन गई है।
इंग्लैण्ड भेजा गया जीवाश्म
करोड़ों साल पुरानी लम्हेटा रॉक के नाम मसहूर जबलपुर के लम्हेटा स्थित पहाडिय़ों से मिलने वाले जीवाश्म जांच के लिए इंग्लैण्ड भेजे गए थे। सालों की रिसचज़् के बाद सामने आया कि जबलपुर डायनासोर की नई प्रजातियों को खोजने के लिए विश्व विज्ञान के क्षेत्र में उपयोगी है। विशेषज्ञों के अनुसार नमज़्दा किनारे बसे जंगलों में डायनासौर के होने के प्रमाण मिलते हैं जो जंगलों में ही कई किलोमीटर की यात्रा कर अफ्रीका तक पहुंच जाया करते थे।
कुछ खास तथ्य
- गन कैरेज फैक्टरी की बाउंड्रीवॉल की खुदाई के समय १८२८ के आसपास डायनासोर का अंडा श्रमिकों के हाथ में लगा था, लेकिन वह इस बात की पहचान नहीं कर पाए थे कि तरबूज के आकार की यह सफेद अनुकृति आखिर किस जीच की है। जांच में पता चला कि यह अंडा है, जो पत्थर में तब्दील हो चुका है। बाद में वैज्ञानिकों के दल द्वारा किए गए परीक्षण से यह बात साफ हुई कि यह डायनासोर का अंडा है।
- वर्ष 1982 में जबलपुर में डायनासोर के अण्डे होने की जानकारी अशोक साहनी ने दी। उन्होंने कुछ अण्डों के जीवाश्म भी खोजे।
- वर्ष 1988 में अमेरिका से आए वैज्ञानिक डॉ. शंकर चटर्जी ने सबसे पहले मांसाहारी डायनासोर की खोज की थी। उसका जबड़ा और शरीर के अन्य हिस्सों के कंकाल भी बड़ा शिमला पहाड़ी के तल (जीसीएफ सेंट्रल स्कूल नं.1) पर मिले थे। इसमें 6 फीट लंबी खोपड़ी भी थी।
- वर्ष1988 के बाद डायनासोर की कुछ हड्डियां भी वैज्ञानिकों के हाथ लगीं।
- वर्ष 2001 में पांच बसेरे विभिन्न स्थानों से खोजे गए थे। इनमें से एक में पांच से छ: अण्डे होने की जानकारी भी सामने आई थी।
Updated on:
04 Nov 2017 05:49 pm
Published on:
04 Nov 2017 02:58 pm
बड़ी खबरें
View Allजबलपुर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
