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अनशन से निकल रही थी जान, संत मदर टेरेसा ने दिया जीवन दान

तीन बार जबलपुर आ चुकी हैं मदर टेरेसा, शिक्षक ने साझा किया संस्मरण

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neeraj mishra

Sep 05, 2016

mother teresa

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जबलपुर। बेसहारा और गरीबों की मदद करने वाली मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में संत की उपाधि दी गई। हालाकि लोग पहले से ही उन्हें संत तुल्य मानते थे। संत मदर टेरेसा से मिल चुके रमेश शर्मा बताते हैं कि मदर टेरेसा जब जीवित थीं, तो उन्होंने जाति, धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर मानवता की सेवा में खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने गरीब, नि:सहाय, अनाथों के बीच प्रेम व सेवा में खीस्त के दर्शन पाए। यही वजह थी कि मदर टेरेसा ने ममता और अपनत्व की छांव में कुष्ठ रोग से ग्रसित वैसे लोगों के जख्मों की सफाई कर मरहम-पट्टी कर उनका पुर्नवास कराया, जिन्हें परिजनों द्वारा छोड़ दिया गया था। शर्मा की जान भी उन्होंने ही बचाई थी।

शर्मा बताते हैं वे मार्च 1975 में सेंट अलॉयसियस शाला के सामने अनशन पर बैठा थे। अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठने के कारण उनकी हालत नाजुक होती जा रही थी। जान पर बन आई थी।। ऐसे में मदर टेरेसा पहुंची। उन्होंने न केवल अनशन तुड़वाया बल्कि उसके साथ घर भी गईं। मदर टेरेसा के व्यक्तित्व से शिक्षक शर्मा इतने प्रभावित हुए कि आज भी मदर टेरेसा का नाम सुनकर उनका हृदय करुणा से भर जाता है।

mother teresa

यह है कहानी

सेंट अलॉयसियस के पूर्व शिक्षक रमेश शर्मा ने बताया कि मार्च 1975 में वे शाला के सामने अनशन कर रहे थे। उनकी हालत नाजुक होती जा रही थी। आठ मार्च को वे अनशन पर थे। इसी दौरान एक जीप आकर वहां रुकी। जीप से मदर टेरेसा उतरीं। मेरी हालत देखकर उनका हदृय करूणा से भर गया। वे तत्काल बिशप हाउस गईं। उन्होंने प्राचार्य स्वर्गीय गिरजानंदन दुबे, प्रोफेसर स्वर्गीय राधाचरण शुक्ल को बुलाकर तत्काल विवाद का निराकरण कराया।

जीप में लेकर गईं घर

शर्मा बताते हैं कि विवाद सुलझाने के बाद वे उन्हें जीप में बैठाकर घर ले जाती हैं। इस दौरान उनके साथ फादर जोसफ, फादर माइकल क्लेर्बन भी थे। रास्ते में वे रोज बेकरी से मेरे लिए ग्लूकोज के बिस्किट खरीदती हैं। इसके बाद जब मदर टेरेसा मेरे घर पहुंचती हैं तो वे मेरी मां गायत्री देवी को गले से लगा लेती हैं। दो माताओं को इस तरह से गले लगना आज भी मन को प्रफुल्लित कर देता है।