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बस्तर में एक साल में ७०० हादसे में २०० रेफर, ट्रॉमा सेंटर नहीं होने से २३ ने गंवाई जान

- ट्रॉमा सेंटर नहीं होने से इलाज के आभाव में मर रहे बस्तरिया।- लगातार मौत के बाद भी शासन प्रशासन नहीं दिखा रहे इस ओर रुचि - मेकाज को तैयार हुए ११ से अधिक हुए, लेकिन अब भी हादसों के इलाज के लिए तैयार नहीं हम  

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बस्तर में एक साल में ७०० हादसे में २०० रेफर, ट्रॉमा सेंटर नहीं होने से २३ ने गंवाई जान

बस्तर में एक साल में ७०० हादसे में २०० रेफर, ट्रॉमा सेंटर नहीं होने से २३ ने गंवाई जान

जगदलपुर. ट्रॉमा नहीं होने की कीमत बस्तरवासी अपनी जान गंवाकर चुका रहे हैं। यह हम नहीं बस्तर में हो रहे सडक़ हादसे में जिस तरह लोगों को रेफर किया जा रहा है और इसमें हो रही मौतें बता रहीं है। दरअसल बस्तर जिले में पिछले एक साल की तरफ नजर डालें तो ७०० से अधिक बड़े सडक़ हादसे हुए हैं जिनमें करीब २०० मामले ऐसे थे जिसमें गंभीर लोगों को बेहतर इलाज के लिए यहां से रेफर किया गया। बुरी बात यह रही कि इसमें २३ लोगों ने जान गंवा दी। इन मौतों के पीछे एक सबसे बड़ा कारण बस्तर में ट्रॉमा सेंटर न होना है। यदि यह सेवाएं बस्तर में चालू रहतीं तो हो सकता है इनमें से कुछ की जान बच जाती। एक दिन पहले ही बस्तर में एक घटना ऐसी घटी जिसमें गंभीर मासूम को इलाज के लिए राजधानी ले जाते वक्त उसकी बस्तर के पास मौत हो गई।

११ साल बाद भी हम हादसों की चुनौतियों से निपटने तैयार नहीं
बड़े हादसे या दुर्घटना होने पर संभाग के एकमात्र मेेडिकल कॉलेज ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार नहीं है। यहां पर मेडिकल कॉलेज शुरू हुए करीब ११ साल हो गए। इसके बाद भी अस्पताल में ट्रामा सेंटर की सुविधाएं अब तक नहीं मिल पाई हैं। वहीं मेकाज में ट्रामा सेंटर शुरू करने शासन से करीब 9 करोड़ रुपए की स्वीकृति मिलने के बाद सारी तैयारी भी पूरी कर ली गई है। लेकिन अब तक यह शुरू नहीं हो पाया है। यही वजह है कि इसकी कीमत मरीजों को चुकानी पड़ रही है। वहीं इसके अलावा सितंबर २०२२ में भी डेढ़ करोड़ अलग से आबंटित किए जिसके तहत इसके लिए २० बेड का वार्ड तैयार होना था। लेकिन अब तक स्थिति जस की तस बनी हुई है।

सोमवार को ही मासूम हो नहीं मिला इलाज, मौत
शहर के एक युवा व्यवसायी के यहां दो वर्षीय मासूम की मौत हो गई। दरअसल घर में खेल के दौरान वह छत से गिर गया। परिवार वाले इलाज के लिए महारानी अस्पताल पहुंचे। यहां इलाज के नाम पर सिर्फ सिटी स्कैन हो सका। जिसके बाद खराब स्थिति को देखते हुए अस्पताल प्रबंधन ने बाहर जाकर विशेषज्ञों को इन्हें दिखाने कहा। बिगड़ती स्थिति को देखते हुए परिवार वाले राजधानी की तरफ रवाना हुए लेकिन भानुपरी के करीब पहुंचते पहुंचते मासूम ने दम तोड़ दिया। यदि ट्रॉमा सेंटर होता तो यहा विशेषज्ञों की देखरेख में इलाज शुरू हो सकता था और शायद मासूम की जान भी बच जाती।


ऐसे कुछ मामले जिसमें हादसे में घायल मरीजों को बाहर ले जाते वक्त चली गई जान

केस - १ : मासूम ने रास्तें में ही तोड़ दिया दम
शहर के वंृदावंन इलाके में रहने वाले एक परिवार के २ वर्ष का मासूम खेल-खेल में छत से गिर गया। घर वाले आनन फानन में इलाज के लिए महारानी अस्पताल पहुंचे। यहां विशेषज्ञों की कमी के चलते सिर्फ सिटी स्कैन ही हो पाया। इसमें सिर में गहरी चोट नजर आई और इंटर ब्लिडिंग भी जांच में सामने आई। विशेषज्ञों की कमी के चलते बच्चे को बेहतर इलाज के लिए रेफर किया गया गया। लेकिन दुर्भाग्य से बस्तर के पास ही बच्चे ने दम तोड़ दिया।

केस - २ : ट्रॉमा सेंटर होता तो सहीं समय से शुरू हो सकता था उपचार
बास्तानार निवासी कश्यप परिवार के राकेश का सडक़ हादसा डिलमिली के पास हुआ। हादसा गंभीर था। जिसमें राकेश के सिर में गंभीर चोट आई। एंबूलेंस के जरिए बच्चे को मेडिकल कॉलेज ले जाया गया। यहां पहले तो तकनिशियन की कमी के चलते उसका उपचार शुरू होने में काफी समय लग गया। किसी तरह जांच हुई तो पता चला स्थिति गंभीर है। इसे ट्रॉमा सेंटर में विशेषज्ञों के बीच ऑपरेशन की जरूरत है। लेकिन यहां सुविधा नहीं है। ऐसे में बाहर ले जाने पर सहमति बनी। लेनिक इससे पहले की उसे विशाखापटनम ले जाते उसने दम तोड़ दिया। अब परिवार वाले कहते हैं कि विशेषज्ञ होते और सुविधा होती तो बच जाती जान।

केस - ३ : इलाज में देरी, नहीं मिल सका इलाज, बुझ गया चिराग
बीजापुर के तर्रेम इलाके के संतोष पुनेम नाम का युवक पेड़ से गिर गया था। परिवार वाले इलाज के लिए जिला अस्पताल लेकर गए। यहां गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे मेकाज इलाज के लिए लाया गया। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल में इलाज की आस लेकर आदिवासी परिवार यहां पहुंचा जरूर लेकिन उनकी उम्मीद पर अस्पताल खरा नहीं उतर सका। पहले ही इलाज में देरी के बाद मेकाज में भी सामान्य जांच के बाद उसे रेफर कर दिया गया। परिवार वालों की बची कुची उम्मीद भी टूट गई। अब राजधानी तक का सफर तय करना था लेकिन उसके पहले ही उनके घर का चिराग बुझ गया।

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