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दिल्ली में बिकेगी बस्तर कॉफी, अगले महीने तक तैयार होंगे सात लाख पौधे

दरभा में कॉफी की खेती का प्रयोग सफल होने के बाद अब एक हजार एकड़ में खेती की तैयारी

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बस्तर कॉफी

जगदलपुर। बस्तर में दो साल पहले दरभा में कॉपी की खेती की शुरुआत की गई। यह प्रयोग अब सफल साबित हो रहा है। कॉफी का उम्मीद से ज्यादा उत्पादन हो रहा है। बस्तर की जलवायु को कॉफी की खेती के अनुकूल पाया गया है। यही वजह है कि अब उद्यानिकी विभाग कॉफी की खेती का रकबा बढ़ाने जा रहा है। उद्यानिकी विभाग को चार महीने पहले भारत सरकार के कॉफी बोर्ड द्वारा ओडिशा के कोरापुट से 265 किलो कॉफी के बीज आवंटित किए गए थे। इन बीजों के माध्यम से सात लाख पौधे तैयार हो रहे हैं, जो कि अगले महीने तक परिपक्व हो जाएंगे और इनसे बस्तर जिले के अलग-अलग ब्लॉक में खेती की जाएगी। बस्तर की कॉफी को रायपुर और दिल्ली में बस्तर कैफे के नाम से बेचने की तैयारी चल रही है। इसकी पैकेजिंग और रिफाइनिंग प्रोसेस को भी पूरी तरह से कमर्शियल किए जाने की तैयारी हो चुकी है। बस्तर में कॉफी की खेती को सफल बनाने में जुटे हार्टीकल्चर कॉलेज के वैज्ञानिक केपी सिंह ने बताया कि बस्तर जिले की कॉफी को छत्तीसगढ़ टी-कॉफी- बोर्ड ने चयनित करते हुए इसे रायपुर और दिल्ली में वस्तर कैफे के नाम से शुरू करने का फैसला लिया है। कुछ महीने पहले जब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी छत्तीसगढ़ आए थे तो उन्होंने बस्तर कॉफी का स्वाद चखा था और इसे राज्य से बाहर ले जाने की सलाह दी थी। इसके बाद सरकार की ओर से इस पर अमल करना शुरू कर दिया गया है। फिलहाल यह कॉफी जगदलपुर के ही बस्तर कैफे में परोसी जा रही है। दरभा में की गई खेती से अब तक 8 हजार क्विंटल बीज का उत्पादन कर लिया गया है। आने वाले दिनों में इसकी मात्रा में और बढ़ोतरी होगी। गौरतलब है कि इस समय दरभा में 20 एकड़ के बाद अब नक्सल प्रभावित डिलमिली में 33 किसानों ने करीब 100 एकड़ में इसकी खेती शुरू कर दी है। उद्यानिकी विभाग के उपसंचालक अजय कुशवाहा ने बताया कि बोर्ड से बीज आने के बाद विभाग खुद अपनी नर्सरी में इसके पौधे तैयार कर रहा है।

जगदलपुर और बस्तर ब्लॉक खेती के लिए अनुकूल नहीं

कॉफी की खेती में बस्तर और जगदलपुर ब्लॉक को शामिल नहीं किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बस्तर और जगदलपुर ब्लॉक की ऊंचाई समुद्र तल से काफी कम है। जबकि दरभा, बास्तानार, लोहंडीगुड़ा, बकावंड और तोकापाल का क्षेत्र काफी की खेती के लिए अनुकूल है। उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कॉफी के लिए समुद्र तल से 500 मीटर की ऊंचाई जरूरी होती है। जगदलपुर और बस्तर ब्लॉक को छोड़ दिया जाए तो हर ब्लॉक में 600 मीटर से ज्यादा ऊंची पहाडिय़ां हैं और उन पर खेती हो सकती है। दरभा और बास्तानार ब्लॉक के अधिकतर गांवों में 600 से 700 मीटर ऊंचे इलाके हैं। इसके साथ इन ऊंचाइयों पर खेत स्लोप में बने हैं। जो कॉफी की खेती के लिए बेहद ही अनुकूल हैं।

दरभा, बास्तानार और लोहांडीगुड़ा के ५४ गांवों में होगी खेती

जो बीज मिले हैं उससे करीब 7 लाख पौधे जुलाई तक तैयार कर लिए जाएंगे। यह पौधे करीब एक हजार एकड़ में लगाए जाएंगे। पौधे दरभा, बास्तनार और लोहंडीगुड़ा में लगाए जाएंगे। 54 गांवों में की जाने वाली कॉफी की खेती के लिए सरकारी जमीन और किसानों की जमीन का उपयोग किया जाएगा। कॉफी के पौधे एक बार लगाने के बाद उनसे लगभग 60 सालों तक फसल ली जा सकती है। योजना के अनुसार तोकापाल ब्लॉक के 9 गांवों में 1 हजार 75 एकड़, लोहांडीगुड़ा के 11 गांवों में 1 हजार 27 एकड़, बस्तानार के 14 गांवों में 1 हजार 445 एकड़, बकावण्ड के 7 गांवों में 460 एकड़ में और दरभा ब्लॉक के 13 गांवों में 1 हजार 101 एकड़ में कॉफी की खेती होगी।